शारदीय नवरात्रि 2025 (Shardiya Navratri)
शारदीय नवरात्रि सनातन धर्म के सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है, जो नौ दिनों तक चलने वाला एक पावन पर्व है। यह उत्सव देवी दुर्गा के नौ विभिन्न स्वरूपों की उपासना को समर्पित है, जो शक्ति, समृद्धि और ज्ञान का प्रतीक मानी जाती हैं। हर साल आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में मनाई जाने वाली यह नवरात्रि, बुराई पर अच्छाई की विजय और आध्यात्मिक जागृति का संदेश देती है ।
शारदीय नवरात्रि 2025 कब है?
शारदीय नवरात्रि 2025 सोमवार, 22 सितंबर 2025 से शुरू होगी और गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025 को समाप्त होगी । यह हर साल पितृ अमावस्या के अगले दिन आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारंभ होती है ।
घटस्थापना का शुभ मुहूर्त
शारदीय नवरात्रि की शुरुआत कलश स्थापना (घटस्थापना) के साथ होती है, जिसे अत्यंत शुभ माना जाता है। सनातन धर्म में किसी भी महत्वपूर्ण अनुष्ठान के लिए शुभ मुहूर्त का चयन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। यह मान्यता है कि सही समय पर किया गया कोई भी कार्य ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं के साथ अधिक अनुकूल रूप से संरेखित होता है, जिससे उसके फल अधिक प्रभावी और सकारात्मक होते हैं। घटस्थापना के लिए निर्धारित मुहूर्त यह सुनिश्चित करता है कि भक्त अपनी साधना की शुरुआत ऐसे समय में करें जब ब्रह्मांड की ऊर्जाएं उनके आध्यात्मिक प्रयासों के लिए सबसे अधिक सहायक हों।
- घटस्थापना मुहूर्त: 22 सितंबर 2025 को सुबह 6:27 बजे से सुबह 7:58 बजे तक
- अभिजित मुहूर्त: 22 सितंबर 2025 को सुबह 12:07 बजे से दोपहर 12:55 बजे तक
नवरात्रि के नौ दिनों की तिथियां और देवियों की पूजा
नवरात्रि के प्रत्येक दिन मां दुर्गा के एक विशेष स्वरूप की पूजा की जाती है। यह नौ स्वरूप शक्ति, ज्ञान और समृद्धि के विभिन्न पहलुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन नौ दिनों की तिथियां और संबंधित देवियां इस प्रकार हैं:
शारदीय नवरात्रि 2025: तिथियाँ व देवी पूजन
- 22 सितम्बर (सोमवार) – प्रतिपदा: माँ शैलपुत्री
- 23 सितम्बर (मंगलवार) – द्वितीया: माँ ब्रह्मचारिणी
- 24 सितम्बर (बुधवार) – तृतीया: माँ चंद्रघंटा
- 25 सितम्बर (गुरुवार) – तृतीया: माँ चंद्रघंटा
- 26 सितम्बर (शुक्रवार) – चतुर्थी: माँ कूष्मांडा
- 27 सितम्बर (शनिवार) – पंचमी: माँ स्कंदमाता
- 28 सितम्बर (रविवार) – षष्ठी: माँ कात्यायनी
- 29 सितम्बर (सोमवार) – सप्तमी: माँ कालरात्रि
- 30 सितम्बर (मंगलवार) – अष्टमी: माँ महागौरी (महाअष्टमी)
- 01 अक्टूबर (बुधवार) – नवमी: माँ सिद्धिदात्री (महानवमी)
- 02 अक्टूबर (गुरुवार) – दशमी: विजयदशमी व दुर्गा विसर्जन
दुर्गा विसर्जन और दशहरा
शारदीय नवरात्रि का समापन 2 अक्टूबर 2025 (गुरुवार) को दुर्गा विसर्जन और दशहरा के साथ होगा। इस दिन नवरात्रि व्रत का पारण किया जाता है और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक दशहरा पर्व मनाया जाएगा।
क्या है शारदीय नवरात्रि?
"नवरात्रि" शब्द संस्कृत के दो शब्दों "नव" (नौ) और "रात्रि" (रात) से मिलकर बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है नौ रातें। यह नौ रातें और दस दिन दिव्य स्त्री ऊर्जा, मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा के लिए समर्पित हैं।
नवरात्रि की ये नौ रातें भक्तों को बाहरी दुनिया के कोलाहल से हटकर अपनी आंतरिक चेतना पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर प्रदान करती हैं। यह एक संरचित आध्यात्मिक आश्रय के समान है, जहाँ व्यक्ति आत्म-शुद्धि और आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए एक निर्धारित समय-सीमा में गहन साधना में लीन होता है। इस अवधि में, भक्त अपनी आत्मा की शुद्धि, आत्मज्ञान की प्राप्ति और जीवन की बाधाओं को दूर करने के लिए मां दुर्गा की उपासना करते हैं।
मां दुर्गा शक्ति, साहस और पराक्रम का प्रतीक हैं। उनकी उपासना से भक्तों को मानसिक और आत्मिक शांति प्राप्त होती है, जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं, और आत्मविश्वास व साहस का विकास होता है, जो उन्हें जीवन की चुनौतियों से लड़ने की प्रेरणा देता है। यह त्यौहार केवल धार्मिक महत्व तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता का भी प्रतीक है, जिसे देश के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग रीति-रिवाजों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है ।
शारदीय नवरात्रि की पौराणिक कथा
शारदीय नवरात्रि का मूल देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर नामक शक्तिशाली असुर के वध की पौराणिक कथा में निहित है। यह कथा बुराई पर अच्छाई की विजय और धर्म की स्थापना का प्रतीक है।
महिषासुर का आतंक: महिषासुर एक अत्यंत बलशाली असुर था, जिसे ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त था कि उसे किसी भी देवता या पुरुष द्वारा मारा नहीं जा सकता । इस अद्वितीय वरदान ने उसे अत्यंत घमंडी और अत्याचारी बना दिया। वह स्त्री को हर लिहाज से कमजोर समझता था और इसलिए उसे लगा कि उसे कभी कोई मार नहीं सकेगा, खासकर कोई स्त्री तो बिल्कुल भी नहीं । इस अहंकार के साथ, उसने स्वर्ग पर चढ़ाई कर दी, देवताओं को पराजित किया और स्वयं इंद्रासन पर बैठ गया, जिससे तीनों लोकों में हाहाकार मच गया ।
देवी दुर्गा का प्राकट्य: जब देवता महिषासुर के आतंक से त्रस्त हो गए और उन्हें कोई उपाय नहीं सूझा, तो वे ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास सहायता के लिए पहुँचे। देवताओं की प्रार्थना सुनकर, त्रिदेवों और अन्य सभी देवताओं ने अपनी दिव्य शक्तियों को एक साथ मिलाया। इस दिव्य ऊर्जा के पुंज से एक तेजस्वी, विस्मयकारी और सर्वशक्तिमान स्त्री स्वरूप का निर्माण हुआ, जिसे देवी दुर्गा कहा गया । प्रत्येक देवता ने अपनी विशेष शक्ति और अस्त्र-शस्त्र उन्हें प्रदान किए, जिससे वे महिषासुर का सामना करने के लिए पूरी तरह से तैयार हो गईं ।
महिषासुर का वध: देवी दुर्गा ने महिषासुर के साथ नौ दिनों तक भयंकर युद्ध किया। यह युद्ध केवल भौतिक स्तर पर नहीं था, बल्कि यह धर्म और अधर्म, ज्ञान और अज्ञानता के बीच का संघर्ष था। महिषासुर अपनी इच्छानुसार कई रूप बदल सकता था, लेकिन देवी दुर्गा ने हर रूप में उसे पराजित किया । अंततः दसवें दिन, मां दुर्गा ने अपने दिव्य त्रिशूल से महिषासुर का वध कर दिया और इस जगत को उसके अत्याचार से मुक्त कराया ।
प्रतीकात्मक महत्व: "महिषासुर मर्दिनी" का अर्थ है 'महिषासुर का वध करने वाली देवी' । यह कथा केवल एक पौराणिक कहानी नहीं है, बल्कि यह स्त्री शक्ति (शक्ति) के सर्वोच्च महत्व और आंतरिक बुराइयों (जैसे अहंकार, अज्ञानता, लालच और मोह) पर विजय प्राप्त करने की आवश्यकता का एक शक्तिशाली रूपक है । यह कहानी दर्शाती है कि सबसे बड़ी बाधाएं अक्सर व्यक्ति के भीतर ही होती हैं और उन्हें दूर करने के लिए आंतरिक शक्ति और विवेक की आवश्यकता होती है। देवी दुर्गा का यह स्वरूप स्त्री के भीतर छिपी अद्भुत शक्ति और सामर्थ्य का प्रतिनिधित्व करता है, यह साबित करता है कि नारी केवल कोमल नहीं, बल्कि शक्तिशाली, निर्णायक और परिवर्तनकारी भी हो सकती है। नवरात्रि का पर्व इस आंतरिक संघर्ष और विजय का प्रतीक है, जो भक्तों को अपने भीतर के 'महिषासुर' को नष्ट करने और सच्चाई व विवेक को स्थापित करने की प्रेरणा देता है।
शारदीय नवरात्रि की पूजा विधि
शारदीय नवरात्रि के दौरान की जाने वाली पूजा और अनुष्ठान अत्यंत विस्तृत और प्रतीकात्मक होते हैं, जो भक्तों को दिव्य ऊर्जा के साथ अधिकतम संरेखण प्राप्त करने में मदद करते हैं। इन अनुष्ठानों की जटिलता और विशिष्टता केवल परंपराएं नहीं हैं, बल्कि ये गहरी प्रतीकात्मकता और ऊर्जा विज्ञान पर आधारित हैं।
A. कलश स्थापना की विस्तृत विधि
कलश स्थापना नवरात्रि का पहला और सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जो नौ दिवसीय उत्सव के आरंभ का प्रतीक है। इसका सही विधि से किया जाना अत्यंत आवश्यक है:
1. शुद्धि और तैयारी: नवरात्रि के पहले दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूरे घर को शुद्ध करें, विशेषकर पूजा स्थल को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें। मुख्य द्वार की चौखट पर आम के पत्तों का तोरण सजाएं, जो शुभता का प्रतीक है ।
2. चौकी और प्रतिमा स्थापना: पूजा स्थल पर उत्तर या उत्तर-पूर्व दिशा में एक साफ लकड़ी की चौकी स्थापित करें। वास्तु शास्त्र के अनुसार, यह दिशा ऊर्जा के प्रवाह के लिए सबसे शुभ मानी जाती है, जिससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इस चौकी पर मां दुर्गा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें । यदि संभव हो तो मां शैलपुत्री की भी प्रतिमा रखें, क्योंकि वे प्रथम पूज्य देवी हैं । एक मिट्टी के बर्तन (या चौड़े मुंह वाले पात्र) में साफ मिट्टी और जौ के बीज बोएं। इस पात्र को चौकी के पास स्थापित करें । जौ को समृद्धि और नए जीवन का प्रतीक माना जाता है।
3. कलश स्थापित करना: एक तांबे या मिट्टी के कलश को अच्छी तरह धोकर उस पर स्वास्तिक चिह्न बनाएं और सिंदूर का टीका लगाएं । कलश के गले में मोली (पवित्र धागा) लपेटें ।
कलश में शुद्ध जल या गंगाजल भरें। इसमें एक सुपारी, कुछ सिक्के, दूर्वा घास, हल्दी की एक गांठ और अक्षत (साबुत चावल) डालें। ये सभी सामग्री समृद्धि, पवित्रता और बाधा निवारण का प्रतीक हैं।
कलश के मुख पर आम के पांच पत्ते रखें। एक नारियल को लाल वस्त्र में लपेटकर उस पर कलावा बांधें और उसे आम के पत्तों के ऊपर इस तरह रखें कि उसका मुख ऊपर की ओर हो। नारियल को पूर्णता और शुभता का प्रतीक माना जाता है।
इस तैयार कलश को जौ बोए हुए मिट्टी के बर्तन के ऊपर या पास स्थापित करें। कई भक्त कलश स्थापना के साथ अखंड दीपक भी जलाते हैं, जो नौ दिनों तक लगातार जलता रहता है और ज्ञान व प्रकाश का प्रतीक है ।
4. पृथ्वी माता का आह्वान: कलश के नीचे जो मिट्टी फैलाई गई है, उसे दाएं हाथ से स्पर्श करते हुए इस मंत्र का जप करें:
"ओम भूरसि भूमिरस्यदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्रीं। पृथिवीं यच्छ पृथिवीं दृग्वंग ह पृथिवीं मा हि ग्वंग सीः।।"
अर्थ- हे धरती माता! आप ही सम्पूर्ण जीवन का आधार और पालनकर्ता हैं। आपके विशाल आँचल में पूरा संसार समाया हुआ है और आप ही तीनों लोकों का भार सहन करती हैं। हे धरा! आप सदैव स्थिर रहें और हमें भी अडिग बनाए रखें। हमें शक्ति और उत्तम स्वास्थ्य प्रदान
करें, हमारे जीवन से सभी कष्ट और पीड़ा को दूर रखें और सदा हमारा सहारा बनकर हमारी रक्षा करती रहें।
यह मंत्र पृथ्वी माता से स्थिरता और समर्थन का आह्वान करता है ।
B. मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की दैनिक पूजा विधि
नवरात्रि के नौ दिनों तक प्रतिदिन सुबह-शाम मां दुर्गा के संबंधित स्वरूप की पूजा की जाती है। यह दैनिक पूजा भक्तों को प्रत्येक देवी की विशिष्ट ऊर्जा और गुणों से जुड़ने का अवसर प्रदान करती है:
प्रतिदिन सुबह-शाम दीपक जलाएं। मां की प्रतिमा या चित्र पर अक्षत, सिंदूर और लाल पुष्प अर्पित करें। फल और प्रसाद चढ़ाएं। दुर्गा सप्तशती, देवी महात्म्य, या गायत्री चालीसा का पाठ करें । अंत में मां की आरती करें और प्रसाद सभी में वितरित करें।
C. कन्या पूजन का महत्व और विधि
कन्या पूजन नवरात्रि के सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठानों में से एक है, जो शारदीय नवरात्रि 2025 में 01 अक्टूबर 2025 या 02 अक्टूबर 2025 को किया जाएगा।
इसमें नौ छोटी कन्याओं को देवी मां का साक्षात स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है, और उनके साथ एक लड़के को भी भैरव का रूप मानकर पूजा जाता है। यह अनुष्ठान शक्ति के साथ शिव (भैरव) के पूरक पहलू को दर्शाता है, जो पूर्णता और संतुलन का प्रतीक है।
1. आमंत्रण और स्वागत: कन्या पूजन के लिए 9 कन्याओं और एक लड़के को सम्मानपूर्वक आमंत्रित करें । उन्हें श्रद्धापूर्वक एक साफ जगह पर आसन लगाकर बिठाएं।
2. शुद्धिकरण और तिलक: सभी कन्याओं और लड़के के पैरों को स्वच्छ पानी से धोकर शुद्ध करें। इसके बाद उनके माथे पर रोली और अक्षत का तिलक लगाएं।
3. पूजा और आरती: उन्हें मां दुर्गा का प्रतीक मानकर विधिपूर्वक पूजा और आरती करें । आप चाहें तो कन्याओं के पैरों को रंग से रंगकर उन्हें चुनरी भी ओढ़ा सकते हैं ।
4. भोग और भोजन: हलवा, पूड़ी, चना, खीर और फल का सात्विक भोग तैयार करें। ध्यान रहे कि इसमें लहसुन-प्याज का उपयोग बिल्कुल न हो । सबसे पहले माता रानी को भोग लगाएं, फिर वही भोग कन्याओं को परोसें ।
5. उपहार और आशीर्वाद: भोजन कराने के बाद, अपनी श्रद्धा अनुसार उपहार और दक्षिणा दें । अब कन्याओं और भैरव के चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद लें और उन्हें सम्मानपूर्वक विदा करें ।
कन्या पूजन करने से मां दुर्गा अत्यंत प्रसन्न होती हैं, भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, और घर-परिवार में सुख-समृद्धि आती है ।
शारदीय नवरात्रि मंत्र जप और उनके लाभ
मंत्र जप नवरात्रि साधना का एक अभिन्न अंग है। मंत्र केवल शब्दों का दोहराव नहीं हैं, बल्कि ये ध्वनि कंपन के माध्यम से चेतना को केंद्रित करने और विशिष्ट दिव्य ऊर्जाओं को आकर्षित करने का एक शक्तिशाली साधन हैं। इन्हें अक्सर 'बीज मंत्र' कहा जाता है, जिसमें ब्रह्मांडीय ध्वनियों की शक्ति निहित होती है। जब इन ध्वनियों को दोहराया जाता है, तो वे शरीर और मन में विशिष्ट कंपन उत्पन्न करती हैं, जो व्यक्ति की चेतना को प्रभावित करती हैं और ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं के साथ संरेखित करती हैं। यह केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि एक प्रकार का 'ऊर्जा इंजीनियरिंग' है, जो भक्तों को अपनी आंतरिक ऊर्जा को संशोधित करने और बाहरी वास्तविकता को प्रभावित करने का एक साधन प्रदान करता है।
प्रत्येक देवी के विशिष्ट मंत्र
प्रत्येक देवी के लिए विशिष्ट मंत्रों का जप उनकी विशेष ऊर्जा और गुणों को आकर्षित करता है, जैसा कि ऊपर पूजा विधि खंड में उल्लेख किया गया है।
मंत्र जप के आध्यात्मिक और व्यक्तिगत लाभ
मंत्र जप के कई गहरे लाभ होते हैं:
· यह एकाग्रता बढ़ाता है और तनाव कम करता है ।
· सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और आत्मविश्वास बढ़ता है ।
· करियर में आने वाली बाधाओं को दूर करने में मदद मिलती है ।
· सफलता और समृद्धि प्राप्त होती है ।
मंत्र जप के नियम
मंत्रों का अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए कुछ नियमों का पालन करना महत्वपूर्ण है:
· जप करते समय मन में सकारात्मक विचार रखें ।
· देवी दुर्गा की मूर्ति या चित्र के सामने बैठकर जप करें ।
· रुद्राक्ष या तुलसी की माला से जप करें ।
· प्रतिदिन कम से कम 108 बार जप करें ।
नवरात्रि मंत्र, देवी और उनके लाभ
1. ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
· देवी:नवार्ण मंत्र (मां दुर्गा)
· लाभ: बाधा निवारण, आत्मविश्वास वृद्धि, करियर में सफलता।
2. ॐ दुं दुर्गायै नमः
· देवी: मां दुर्गा
· लाभ: आत्मविश्वास बढ़ाना, नकारात्मक ऊर्जा का नाश।
3. ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
· देवी: गायत्री माता
· लाभ: ज्ञान, बुद्धि और एकाग्रता की प्राप्ति।
4. ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
· देवी: मां लक्ष्मी
· लाभ: धन, समृद्धि और आर्थिक सफलता।
5. ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः
· देवी: मां सरस्वती
· लाभ: ज्ञान, रचनात्मकता, कला और लेखन में सफलता।
6. ॐ शैलपुत्री देव्यै नमः
· देवी: मां शैलपुत्री
· लाभ: शक्ति और स्थिरता।
7. ॐ ब्रह्मचारिण्यै नमः
· देवी: मां ब्रह्मचारिणी
· लाभ: तपस्या, वैराग्य और संयम।
8. ॐ चंद्रघंटायै नमः
· देवी: मां चंद्रघंटा
· लाभ: भय मुक्ति और आत्मविश्वास।
9. ॐ कूष्माण्डायै नमः
· देवी: मां कूष्मांडा
· लाभ: स्वास्थ्य, ऊर्जा और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का आशीर्वाद।
10. ॐ स्कन्दमातायै नमः
· देवी: मां स्कंदमाता
· लाभ: संतान सुख, मातृत्व प्रेम।
11. ॐ कालरात्र्यै नमः
· देवी: मां कालरात्रि
· लाभ: विवाह बाधा निवारण और शत्रु पर विजय।
12. ॐ महागौर्यै नमः
· देवी: मां महागौरी
· लाभ: नकारात्मक शक्तियों का नाश, भय मुक्ति और शांति।
13. ॐ सिद्धिदात्र्यै नमः
· देवी: मां सिद्धिदात्री
· लाभ: सभी सिद्धियों की प्राप्ति और मनोकामना पूर्ति।
चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि में अंतर
· चैत्र नवरात्रि वसंत ऋतु में (मार्च-अप्रैल), जबकि शारदीय नवरात्रि शरद ऋतु में (सितंबर-अक्टूबर) मनाई जाती है।
· चैत्र नवरात्रि भारतीय नववर्ष की शुरुआत के साथ होती है, शारदीय नवरात्रि शरद ऋतु के प्रारंभ का प्रतीक होती है।
· चैत्र नवरात्रि के अंतिम दिन राम नवमी का पर्व मनाया जाता है, जबकि शारदीय नवरात्रि दशहरा के साथ समाप्त होती है।
· चैत्र नवरात्रि के दौरान पेड़-पौधों में नई पत्तियां और फूल आते हैं, जबकि शारदीय नवरात्रि के समय पेड़ों में सूखापन और ठंडी हवा रहती है।
· चैत्र नवरात्रि का समय नई फसल की बुवाई का होता है, वहीं शारदीय नवरात्रि का समय फसल की कटाई और संग्रहण का होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. हम शारदीय नवरात्रि क्यों मनाते हैं?
शारदीय नवरात्रि मां दुर्गा द्वारा महिषासुर के वध और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। यह शक्ति, साहस और आत्मिक शुद्धि का पर्व है, जो आध्यात्मिक जागरूकता और समृद्धि लाता है।
2. शारदीय नवरात्रि में क्या करें?
शारदीय नवरात्रि में कलश स्थापना करें, नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा करें, मंत्र जप करें, दुर्गा सप्तशती का पाठ करें, सात्विक भोजन करें, दान-पुण्य करें, और अष्टमी/नवमी पर कन्या पूजन करें ।
3. शारदीय नवरात्रि घर पर कैसे करें?
· पूजा स्थल को अच्छी तरह से साफ करें।
· शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना करें।
· मां दुर्गा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
· प्रतिदिन नौ देवियों की विधिपूर्वक पूजा करें।
· दीपक जलाएं और भोग अर्पित करें।
· नियमित आरती करें और मंत्र जप करें।
· पूरे व्रत काल में सात्विक नियमों का पालन करें।
4. शारदीय नवरात्रि की पूजा कैसे करें?
· ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें।
· पूजा स्थल को साफ़ करके गंगाजल या पवित्र जल से शुद्ध करें।
· शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना करें।
· मां दुर्गा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
· नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा करें - अक्षत, सिंदूर, पुष्प, फल, मिठाई आदि चढ़ाएं।
· रोजाना दीपक जलाकर आरती करें और मंत्र जप करें।
· दुर्गा सप्तशती या देवी महात्म्य का पाठ करें।
· अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन करें।
· पूरे व्रत काल में सात्विक जीवनशैली और संयम का पालन करें।
5. शारदीय नवरात्रि 2025 कब शुरू होगी?
शारदीय नवरात्रि 2025 सोमवार, 22 सितम्बर 2025 से प्रारंभ होगी। इस दिन अश्विन मास की शुक्ल प्रतिपदा तिथि से घटस्थापना की जाती है, जो मां दुर्गा की पूजा का शुभ प्रारंभ होता है। घटस्थापना (कलश स्थापना) का शुभ मुहूर्त 22 सितंबर 2025 को सुबह 6:27 बजे से सुबह 7:58 बजे तक रहेगा। शारदीय नवरात्रि कुल नौ दिनों तक मनाई जाती है और इसका समापन दशमी तिथि को विजयादशमी (दशहरा) पर्व के साथ होता है, जो वर्ष 2025 में 2 अक्टूबर 2025 को मनाया जाएगा। यह पर्व शक्ति उपासना, आत्मिक शुद्धि और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है।
6. शारदीय नवरात्रि में क्या न करें?
· तामसिक और नशीले पदार्थों आदि का सेवन न करें।
· बाल, नाखून और दाढ़ी न काटें (विशेषकर व्रतधारियों के लिए)।
· चमड़े की वस्तुएं पूजा स्थल पर न लाएं।
· घर में झगड़ा, कलह या अपवित्रता का वातावरण न बनने दें।
· व्रत के दौरान दिन में न सोएं - यह व्रत नियमों का उल्लंघन माना जाता है।
· अशुद्ध व अशोभनीय विचारों से दूर रहें और शुद्ध आचरण रखें।
7. शारदीय नवरात्रि के दिन क्या करें?
· हर दिन मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधिपूर्वक पूजा करें।
· प्रत्येक देवी के मंत्रों का जप और स्तुति पाठ करें।
· व्रत रखें (यदि संभव हो) और सात्विक भोजन ग्रहण करें।
· पूजा स्थल को स्वच्छ रखें और प्रतिदिन दीपक जलाएं।
· भोग अर्पित करें और आरती करें।
· दुर्गा सप्तशती या देवी महात्म्य का पाठ करें।
· घर का वातावरण सकारात्मक और शांतिपूर्ण बनाए रखें।
· अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन अवश्य करें।
· दान-पुण्य करें और जरूरतमंदों की मदद करें।







