Sanatan Logo
Ganesh Logo
सकट चौथ 2026

चतुर्थी तो प्रत्येक मास में दो बार आती है एक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी और दूसरी कृष्ण पक्ष की चतुर्थी। शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते है और कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते है। ये दोनों ही चतुर्थी भगवान गणेश को समर्पित होती है। 2026 में माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी है। इसे तिलकुटा चौथ, माघ संकष्टी चतुर्थी और वक्रतुंडी चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। वर्ष 2026 में यह व्रत संतान की खुशहाली और दीर्घायु के लिए रखा जाएगा। 

सकट चौथ क्या है?

सकट चौथ (Sakat Chauth), जिसे पंचांग की भाषा में Magh Sankashti Chaturthi 2026 कहा जाता है, भगवान गणेश को समर्पित एक विशेष व्रत है। 'सकट' शब्द 'संकट' से बना है, जिसका अर्थ है विपत्ति। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और गणेश जी की उपासना करने से संतान और परिवार पर आने वाले सभी संकट टल जाते हैं।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, यदि किसी जातक की संतान के जीवन में बार-बार बाधाएं आ रही हों, तो विशेषज्ञ अक्सर kundli check करने की सला ह देते हैं ताकि राहु या केतु के प्रतिकूल प्रभाव का पता लगाया जा सके। ऐसी स्थिति में सकट चौथ का व्रत और गणेश जी की आराधना उन ग्रहों के दोषों को शांत करने का अचूक उपाय मानी जाती है।

यह व्रत बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। इसे Tilakut Chauth 2026 भी कहते हैं क्योंकि इस दिन भगवान को तिल और गुड़ से बने हुए तिलकुट का भोग लगाना अनिवार्य होता है। यह एक निर्जला व्रत है, जिसे पुत्रवती महिलायें अपनी संतान की लंबी उम्र के लिए पूरे दिन रखती हैं और चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही जल ग्रहण करती हैं।

सकट चौथ 2026 व्रत की तारीख और तिथि

वर्ष 2026 में सकट चौथ जनवरी माह के पहले सप्ताह में मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार 2026 की तिथि और समय निम्नलिखित है। 

• Sakat Chauth 2026 Date: 6 जनवरी 2026, मंगलवार

Sakat Chauth Tithi Timing

• चतुर्थी तिथि प्रारम्भ: 6 जनवरी 2026 को सुबह 08:04 बजे से

• चतुर्थी तिथि समाप्त: 7 जनवरी 2026 को सुबह 06:52 बजे तक

Sakat Chauth Puja Time 2026 (पूजा का शुभ मुहूर्त): शाम की पूजा का समय गोधूलि बेला (सूर्यास्त के समय) में सबसे उत्तम माना जाता है।

• चंद्रोदय समय: रात 08:41 बजे (स्थान के अनुसार समय में अंतर हो सकता है) ।

सकट चौथ पर क्या खास होता है?

इस वर्ष Sakat Chauth 2026 कई मायनों में बेहद खास और दुर्लभ संयोग लेकर आ रही है।

1. अंगारकी चतुर्थी का महायोग (Angarki Chaturthi Yog): वर्ष 2026 में सकट चौथ 6 जनवरी को है और इस दिन मंगलवार (Tuesday) है। जब संकष्टी चतुर्थी मंगलवार को पड़ती है, तो उसे 'अंगारकी चतुर्थी' कहते हैं। शास्त्रों के अनुसार, अंगारकी चतुर्थी का व्रत करने से पूरे साल की सभी चतुर्थियों के व्रत का फल एक साथ मिल जाता है। यह योग कर्ज मुक्ति और भूमि-भवन के सुख के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। इस दुर्लभ योग में पूजा के सटीक समय को जानने के लिए विद्वान मुहूर्त परामर्श लेने का सुझाव देते हैं, ताकि चौघड़िया और अमृत काल के अनुसार की गई प्रार्थना का पूर्ण फल प्राप्त हो सके।

2. साल का पहला बड़ा व्रत: अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, यह 2026 का पहला बड़ा व्रत होगा।

3. संतान के संकट हरने वाला दिन: अन्य चतुर्थियों की तुलना में माघ मास की यह चतुर्थी माताओं के लिए सबसे खास होती है। माना जाता है कि इस दिन गणेश जी ने देवताओं के प्राणों की रक्षा की थी, ठीक उसी तरह वे व्रत रखने वाली माताओं की संतानों की रक्षा हर संकट से करते हैं।

सकट चौथ व्रत कथा (Sakat Chauth Vrat Katha)

सकत चौथ के दिन सबसे पहले माता सकट या गणेश जी की विधिवत पूजा, दीप जलाना, नैवेद्य(भोग) अर्पित करना और व्रत का संकल्प किया जाता है। इसके बाद ही Sakat Chauth Vrat Katha सुनना या पढ़ना शुभ माना जाता है। आइए अब हम विघ्नहर्ता श्री गणेश जी के स्मरण के साथ सकट चौथ की व्रत-कथा प्रारंभ करते हैं।

गणेश पुराण के अनुसार शौनक जी ने जब गणेश जी का चरित्र पूछा तब सूत जी ने उनका वर्णन करते हुए कहा- माता पार्वती जी की दो सखियाँ थी। जया और विजया। वे दोनों अत्यंत ही सुंदर, रूपवती, विवेकमयी, गुणवती और मधुभाषी थी। माता पार्वती उनका बहुत आदर करती थी। एक दिन उन सखियों ने माता पार्वती जी से निवेदन करते हुए कहा- सखी! अपना कोई गण नहीं है, इसलिए अपना एक निजी गण तो अवश्य ही होना चाहिए। 

सखियों के इस प्रकार कहने पर माता पार्वती ने आश्चर्यपूर्वक कहा- ये क्या कह रही हो सखि! हमारे पास करोड़ों गण है, जो शीघ्र ही आज्ञा का पालन करने में तत्पर रहते है। फिर किसी अन्य गण की क्या जरूरत है? सखियों ने कहा- सभी गण शिव भगवान के है। वे उन्ही की आज्ञा को प्रमुख मानते है। नंदी, भृंगी आदि गण जो हमारे कहलाते है, वे भी भगवान की आज्ञा को ही सर्वोपरि मानते है। यदि आप कोई आदेश दे और शिव भगवान उस आदेश की अवहेलना करे तो आपके आदेश को कोई भी गण नहीं मानेगा। आप पूछेंगी तो अवश्य ही कोई न कोई टालमटोल बता दिया जाएगा। पार्वती जी ने थोड़ा विचार किया और फिर कहा- ‘ये जो प्रथमगण है क्या इनमे से भी कोई मेरी आज्ञा की अवहेलना कर सकता है? सखियाँ पार्वती जी को समझाते हुए बोली-‘ प्रथमगण में तो कोई भी हमारा नहीं है, वे सभी भगवान महादेव जी के सैनिक है। शिव जी की आज्ञा से ही वे हमारी रक्षा करने और सभी कार्यों के प्रति देखरेख के लिए ही नियुक्त है इसलिए कृपा करके अपने लिए एक निजी गण का निर्माण अवश्य कीजिए। माता पार्वती ने अपनी सखियों की सलाह को स्वीकार तो कर लिया, किन्तु इस सुझाव को कार्यरूप में अभी सम्पन्न नहीं किया था। वह बात वहीं रही, और कुछ दिनों के साथ-साथ, वह इसे धीरे-धीरे भूल गई। एक दिन प्रातःकाल के समय, माता पार्वती स्नानकक्ष में स्नान के लिए जा रही थी। उन्होंने नंदी को आदेश दिया, "अगर कोई आए, तो रोक देना।" और फिर वे अंदर चली गईं। तभी भगवान शंकर कहीं से आकर भीतर प्रवेश करने लगे। नंदीश्वर ने उन्हें रोकते हुए प्रार्थना की, "माता जी स्नान कर रही हैं, इसलिए यही ठहरने की कृपा करे। इस पर शिव जी ने कहा- अरे करने दो स्नान। मुझे अत्यंत आवश्यक कार्य है। इस प्रकार नंदी के वचनों की अवहेलना करके शिव जी सीधे स्नानकक्ष में जा पहुंचे। भगवान शिव जी के अचानक आगमन पर, स्नान करती हुयी जगत जननी लज्जावश अत्यंत सिमट गयी। शिव जी भी बिना कुछ कहे चुपचाप चले गए। फिर, स्नान करने के बाद, पार्वती वस्त्र पहनती हुई सोचने लगी कि जया और विजया का सुझाव सही था। मैंने व्यर्थ ही उसकी बात को अनसुना किया। यदि द्वार पर मेरा कोई निजी गण उपस्थित होता तो शिव जी को स्नानकक्ष में आसानी से नहीं आने देता। नंदी ने मेरी आज्ञा का निरादर किया। अब ऐसा प्रतीत होता है कि समस्त गणों पर मेरा पूरा अधिकार नहीं है इसलिए एक ऐसा गण होना चाहिए जिस पर मेरा पूरा अधिकार हो जो मेरी आज्ञा की कभी उपेक्षा न करे, मेरा अपना हो। जो शिव जी के गण है वो शिव जी की आज्ञा होने पर ही मेरी आज्ञा मानते है लेकिन मेरा निजी गण मेरी आज्ञा से ही उनकी आज्ञा मानेगा। मन ही मन ऐसा चिंतन कर उन्होंने अपने अत्यंत पवित्र देह का मैल उतारा और उससे एक चेतन पुरुष का निर्माण कर डाला। जो सभी शुभ लक्षणों से भलीभाँति युक्त था। वह सभी पहलुओं में दोषरहित था, आदर्शणीय सौन्दर्य से युक्त था, उसका रूप अद्वितीय और चमकदार था, वह अत्यंत शक्तिशाली और पराक्रमी था। माता पार्वती ने उसे अनेक प्रकार के वस्त्र, कई प्रकार के आभूषण और बहुत-सा उत्तम आशीर्वाद देकर कहा – 'तुम मेरे पुत्र हो। मेरे अपने ही हो। तुम्हारे समान प्यारा मेरा यहाँ कोई दूसरा नहीं है।' पार्वती के ऐसा कहने पर वह बालक उन्हें नमस्कार करके बोला। गणेश ने कहा- 'माता! आज आपको कौन-सा कार्य आ पड़ा है? मैं आपकी आज्ञा के अनुसार उसे पूर्ण करूँगा। गणेश के ऐसा पूछने पर पार्वती जी अपने पुत्र को उत्तर देते हुए बोलीं । पार्वती जी ने कहा -तात! तुम मेरे पुत्र हो, मेरे अपने हो। इसलिये तुम मेरी बात सुनो। आज से तुम मेरे द्वारपाल बन जाओ। सुपुत्र! मेरे आदेश के बिना कोई भी मेरे महल के भीतर प्रवेश न करने पाये, चाहे वह कहीं से भी आये, कोई भी हो। ऐसा कहकर पार्वती ने गणेश के हाथ में एक बहुत मज़बूत छड़ी दे दी। उस समय उनके सुन्दर रूप को देख कर पार्वती आनंद से भर गयी। उन्होंने परम स्नेहपूर्वक अपने पुत्र का मुख चूमा और छाती से लगा लिया। इसके बाद पार्वती जी ने छड़ी से युक्त गणेश को द्वार पर स्थापित कर दिया। फिर पार्वती नन्दन महावीर गणेश माता पार्वती की आज्ञा के अनुसार हाथ में छड़ी लेकर गृह-द्वार पर पहरा देने लगे। उधर पार्वती अपने पुत्र गणेश को अपने दरवाजे पर नियुक्त करके स्वयं सखियों के साथ स्नान करने लगीं। इसी समय भगवान् शिव, जो परम लीलामय तथा कई प्रकार की लीलाएँ रचने में कुशल हैं, द्वार पर आ पहुँचे। गणेश, शिव जी को पहचानते तो थे नहीं, अतः बोल उठे- 'देव! माता की आज्ञा के बिना आप अभी भीतर नहीं जा सकते । माता स्नान करने बैठ गयी हैं। ऐसा कहकर गणेश ने उन्हें रोकने के लिये छड़ी हाथ में ले ली। उन्हें ऐसा करते देख शिवजी बोले- 'मूर्ख! तू किसे रोक रहा है ? क्या तू मुझे नहीं जानता? मैं शिव ही हूँ और कोई नहीं। फिर महादेव के गण उसे समझाकर हटाने के लिये वहाँ आये और गणेश से बोले- सुनो, हम मुख्य शिवगण ही द्वारपाल हैं और सर्वव्यापक भगवान् शंकर के आदेश से तुम्हें हटाने के लिए यहाँ आये हैं। तुम्हें भी गण समझकर हमलोगों ने मारा नहीं है, अन्यथा तुम कब के मारे गये होते। अब चतुराई इसी में है कि तुम स्वयं ही दूर हट जाओ। क्यों फ़ालतू अपनी मृत्यु को बुलावा दे रहे हो? ऐसा कहने पर भी गणेशजी बिना डरे वहीं खड़े रहे। उन्होंने शिवगणों को फटकारा और दरवाजे को नहीं छोड़ा। तब उन सभी शिवगणों ने शिवजी के पास जाकर सारा हाल उन्हें सुनाया। उनसे सब बातें सुनकर संसार के गतिस्वरूप अद्भुत लीलाविहारी महादेव अपने उन गणों को डाँट, फटकार कर कहने लगे। महेश्वर ने कहा- 'गणो! यह कौन है ? जो इतना स्वेच्छाचारी होकर वैरी की भाँति बक रहा है ? इस नये द्वारपाल को दूर भगा दो। तुम लोग कायर की तरह खड़े होकर उसका समाचार मुझे क्यों सुना रहे हो ।' विचित्र लीला रचने वाले भगवान शंकर के ऐसा कहने पर वे गण दोबारा वहीं लौट आये। तत्पश्चात गणेश द्वारा दोबारा रोके जाने पर शिवजी ने गणों को आदेश दिया कि 'तुम पता लगाओ, यह कौन है और क्यों ऐसा कर रहा है ?' गणों ने पता लगाकर बताया कि 'ये श्री पार्वती माता के पुत्र हैं तथा द्वारपाल के रूप में बैठे हैं।' तब लीलारूप शंकर ने अनोखी लीला करनी चाही तथा अपने गणों का गर्व भी गलित करना चाहा। इसलिये गणों को तथा देवताओं को बुलाकर गणेशजी से भयंकर युद्ध करवाया। पर वे कोई भी गणेश को हरा न सके। तब स्वयं हाथ में शूल धारण करनेवाले महेश्वर आये । गणेशजी ने माता के चरणों का स्मरण किया, तब शक्ति ने उन्हें बल प्रदान कर दिया। सभी देवता शिवजी के पक्ष में आ गये, भीषण युद्ध हुआ। अंत में स्वयं महादेव जी ने आकर त्रिशूल से गणेश जी का सिर‍ काट दिया। जब यह संदेश माता पार्वती जी को मिला, तब वे गुस्से से भर आयीं और बहुत-सी शक्तियों को प्रकट करके उन्होंने बिना कुछ सोचे समझे उन्हें प्रलय करने का आदेश दे दिया। फिर शक्तियों ने उत्पात मचाना शुरू कर दिया । उन शक्तियों का वह प्रज्वलित प्रकाश सभी दिशाओं को प्रज्वलित कर देता है। उसे देखकर सभी शिवभक्त डर गये और भागकर दूर खड़े हो गये। उसी समय देवर्षि नारद वहाँ पहुँचे। नारद जी के वहाँ पहुँचने से देवता बहुत प्रसन्न हुए। तब नारद जी ने ब्रह्मा तथा अन्य देवताओं सहित शंकर जी को प्रणाम किया और कहा कि इस विषय पर सभी को मिलकर विचार करना चाहिए। तब वे सभी देवता नारद जी से परामर्श करने लगे कि इस दुःख को किस प्रकार कम किया जा सकता है। तब उन्होंने निश्चय किया कि जब तक माता पार्वती उन पर कृपा नहीं करेंगी, उन्हें सुख प्राप्त नहीं हो सकेगा। अब इस मामले में आगे सोचना बेकार है. ऐसा विश्वास लेकर नारद सहित सभी देवता और ऋषि-मुनि माता के क्रोध को शांत करने के लिए उनके पास गए और उन्हें प्रसन्न करने लगे। उन्होंने प्रेमपूर्वक उन्हें प्रसन्न करते हुए अनेक स्तोत्रों से उनकी स्तुति की और बार-बार उनके चरणों में नमस्कार किया। 

देवर्षियों ने कहा- जगदम्बे ! तुम्हें नमस्कार है। शिवपलि! तुम्हें प्रणाम है। चण्डिके ! तुम्हें हमारा अभिवादन प्राप्त हो । कल्याणि ! तुम्हें बारंबार प्रणाम है। अम्बे! तुम्हीं आदि- शक्ति हो। आप पुण्य जगत की रचयिता, पालनकर्ता और संहारक हैं। देवी! आपका क्रोध समस्त संसार को व्याकुल कर रहा है इसलिए अब प्रसन्न होकर क्रोध को शांत करें। देवी! हम आपके चरणों में सिर झुकाते हैं।

सभी देवर्षि ऐसा कहकर अत्यन्त नम्रतापूर्वक, बेचैन हो हाथ जोड़कर चण्डिका के सामने खड़े हो गये। उनकी ऐसी बात सुनकर चंडिका(पार्वती) प्रसन्न हो गयी। उनके हृदय में करुणा भर गई। तब उन्होंने ऋषियों से कहा, हे ऋषियों! यदि मेरा पुत्र जीवित हो जाये और वह आपके बीच पूजनीय समझा जाये तो संहार नहीं होगा। संसार में शांति तभी हो सकती है जब आप सब मिलकर उसे ‘सर्वाध्यक्ष' का पद देंगे, अन्यथा आपको सुख नहीं मिल सकता। पार्वती की यह बात सुनकर सभी ऋषि-मुनि उन देवताओं के पास आये और सारा समाचार सुनाया। यह सुनकर इंद्र आदि सभी देवताओं के चेहरे पर उदासी छा गई। वे शंकरजी के पास गए, हाथ जोड़कर उनके चरणों में प्रणाम किया और सारा समाचार निवेदित किया। देवताओं की बात सुनकर भगवान शिव ने कहा- 'ठीक है, हमें भी ऐसा ही करना चाहिए, जिससे सभी लोकों को सुख मिले। 

ऐसा कहकर शिव जी ने देवताओं को आज्ञा दी कि आप लोगों को अब उत्तर दिशा की ओर जाना चाहिए और जो प्राणी सबसे पहले मिले उसका सिर काटकर इस बालक के धड़ से जोड़ देना चाहिए। इसके बाद भगवान शिव की आज्ञा का पालन करने वाले देवताओं ने सारा काम पूरा कर दिया। उन्होंने बालक के शरीर को धोया-पोंछा और उसकी विधिवत पूजा की। फिर वे उत्तर की ओर चले गये। वहां उन्हें सबसे पहले एक दांत वाला हाथी मिला। वे उसका सिर ले आये और उस बालक के धड़ से जोड़ दिया। हाथी के उस सिर को जोड़ने के बाद सभी देवताओं ने भगवान शिव को प्रणाम किया और कहा कि हमने अपना काम पूरा कर लिया है। अब जो कुछ करना बाकी है, उसे आप लोग पूरा करे। तब शिव के पालन के विषय में देवताओं से ऐसे वचन सुनकर सभी देवताओं और पार्षदों को बड़ी प्रसन्नता हुई। तदनन्तर ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी देवताओं ने अपने स्वामी भगवान शंकर को निराकार रूप में प्रणाम करके कहा- 'स्वामिन्! जिस महात्मा की कोख से हम सब पैदा हुए हैं वही तेज इस बालक में वेद मंत्र के उच्चारण के साथ प्रविष्ट हो। इस प्रकार सभी देवताओं ने मिलकर वेद मंत्रों से जल को अभिमंत्रित किया, फिर भगवान शिव का स्मरण कर उस शुद्ध जल को बालक के शरीर पर छिड़क दिया। जैसे ही जल उस बालक को छुआ, वह स्वेच्छा से सचेत हो गया और जीवित होकर ऐसे उठ बैठा जैसे सो रहा हो। वह भाग्यशाली बालक बहुत सुन्दर था। उनका मुख हाथी के समान है। शरीर का रंग हरा-लाल था। उसके चेहरे पर ख़ुशी खेल रही थी। उसकी आकृति बहुत खूबसूरत थी और उसकी सुंदरता की चमक फैल रही थी। उस बालक को जीवित देखकर वहां उपस्थित सभी लोग हर्षित हो गये और सभी का सारा दुःख दूर हो गया। तब सभी बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने बालक को पार्वती जी को दिखाया। अपने पुत्र को जीवित देखकर पार्वती जी अत्यंत प्रसन्न हुईं। इस प्रकार गणेश जी का प्राकट्य हुआ। जो श्री गणेश जी के इस चरित्र को सुनता है या पढ़ता है श्री गणेश उसके शुभ कार्यों में आने वाले विघ्नों को हर लेते है तथा श्रोता और वक्ता दोनों को ही अपने कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।

सकट चौथ व्रत पूजा विधि (Sakat Chauth Puja Vidhi)

सकट चौथ पूजा विधि का सही पालन करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है। परम्परा के अनुसार पूजा विधि अलग-अलग हो सकती है, इस लेख में आपको सरल Sakat Chauth Puja Vidhi दी गयी है जो इस प्रकार है।

1. स्नान और सूर्य अर्घ्य: प्रातःकाल उठकर स्नान करें और लाल वस्त्र धारण करें। सूर्य देव को जल अर्पित करें।

2. संकल्प: हाथ में जल और अक्षत लेकर इस पवित्र व्रत का संकल्प लें— "हे गणेश जी, मैं अपनी संतान की रक्षा हेतु आज निर्जला व्रत का संकल्प लेती हूं।"

3. शाम की पूजा: सूर्यास्त के बाद एक लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं। गणेश-गौरी को स्थापित करें और विधिवत पूजन करें।

4. तिलकुट का भोग: गणेश जी को चंदन, फूल और दूर्वा अर्पित करें। इसके बाद तिल और गुड़ से बने लड्डू या तिलकुट (Tilkut) का भोग लगाएं। साथ में अपनी परम्परा के अनुसार शकरकंद (Sweet Potato) और अमरूद भी चढ़ाएं।

5. चंद्रमा को अर्घ्य: चंद्रोदय होने पर, चंद्रमा को जल, दूध और रोली मिश्रित अर्घ्य दें।

6. व्रत पारण: अर्घ्य देने के बाद गणेश जी का प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोलें। शास्त्रों के अनुसार, श्रद्धापूर्वक किया गया यह व्रत संतान के जीवन की हर बाधा को दूर करने की शक्ति रखता है।

सकट चौथ मंत्र जप

पूजा के समय इन मंत्रों का जप अवश्य करें:

• गणेश महामंत्र: "ॐ श्री गणेशाय नमः"

• संकट नाशन मंत्र: "ॐ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥"

• चंद्रमा को अर्घ्य देते समय: "ॐ सो सोमाय नमः"

सकट चौथ पर ध्यान रखने योग्य बातें (Do’s and Don’ts)

व्रत का पूर्ण फल पाने के लिए यह जानना जरूरी है कि Sakat Chauth Par Kya Karein और किन कार्यों से बचें। 

क्या करें (Do's):

• दूर्वा अर्पण: भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए पूजा में उन्हें दूर्वा चढ़ाना अत्यंत शुभ होता है।

• सकारात्मक माहौल: घर का माहौल भक्तिमय और खुशहाल रखें। अपने परिजनों और मित्रों को happy sakat chauth की शुभकामनाएं दे और बड़ों और गुरुजनों का आशीर्वाद लें।

• दान का महत्व: पूजा संपन्न होने के बाद Sakat Chauth Daan करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। आप तिल, गुड़, कंबल या अनाज किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को अवश्य दान करें।

क्या न करें (Don'ts):

• तुलसी निषेध: गणेश जी की पूजा में तुलसी दल (पत्ते) का प्रयोग भूलकर भी न करें, क्योंकि यह शास्त्रों में वर्जित है।

• काला रंग: शुभ कार्यों में काला रंग नकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। पूजा के दौरान काले कपड़े पहनने से बचें; इसके बजाय लाल या पीला रंग धारण करें।

• चंद्र दर्शन बिना भोजन: यह व्रत चंद्रमा को अर्घ्य देने पर ही पूर्ण होता है। इसलिए, बिना चंद्रमा को अर्घ्य दिए भोजन या जल ग्रहण न करें।

सकट चौथ का ज्योतिषीय महत्व

ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों की स्थिति का बड़ा महत्व है और Sakat Chauth 2026 का सीधा संबंध बुध (बुद्धि के कारक) और चंद्रमा (मन के कारक) से है।

• बुध ग्रह बलिष्ठ: भगवान गणेश बुध ग्रह के अधिपति माने जाते हैं। यदि किसी बच्चे का मन पढ़ाई में नहीं लगता या उसकी वाणी में कोई दोष है, तो इस दिन की गई पूजा बहुत फलदायी होती है। गणेश उपासना से बुध ग्रह अनुकूल होता है और बुद्धि कुशाग्र होती है।

• चंद्रमा का प्रभाव: चंद्रमा मन का कारक है। सकट चौथ पर चंद्रमा को अर्घ्य देने से मानसिक शांति मिलती है और घर परिवार में खुशहाली आती है।

• ज्योतिषीय उपाय (Astrological Remedies): संतान की खुशहाली के लिए कुछ विशेष Sakat Chauth Ke Upay भी किए जाते हैं। उदाहरण के लिए, इस दिन गणेश जी को सुपारी और इलायची चढ़ाने से संतान के करियर में आ रही बाधाएं दूर होती हैं।

यदि आपकी संतान की कुंडली में बुध या चंद्रमा अत्यधिक पीड़ित हैं, तो किसी विशेष अनुष्ठान के लिए आप विशेषज्ञ परामर्श ले सकते है।

विशेषज्ञ से परामर्श लेकर किया गया सटीक उपाय और विधि-विधान से पूर्ण किया गया अनुष्ठान जीवन में चमत्कारिक बदलाव ला सकता है।

सकट चौथ का महत्व (Significance)

धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से Sakat Chauth Ka Mahatva भारतीय संस्कृति में बहुत गहरा स्थान रखता है।

• मातृ शक्ति का प्रतीक: यह व्रत इस बात का जीवंत उदाहरण है कि एक मां की प्रार्थना में कितनी शक्ति होती है, जो अपनी संतान के लिए निर्जला रहकर तप करती है।

• ऋतु परिवर्तन और स्वास्थ्य: माघ के महीने में कड़ाके की ठंड होती है। इस पर्व पर तिल और गुड़ खाने का विधान है, जिससे शरीर में गर्मी बनी रहती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। यह बदलते मौसम के लिए बहुत जरूरी है।

• संतान के लिए महत्व: यदि हम Significance of Sakat Chauth for Child की बात करें, तो पारंपरिक रूप से यह व्रत पुत्र की दीर्घायु, उन्नति और उज्ज्वल भविष्य के लिए किया जाता है।

सकट चौथ पर तैयार किए जाने वाले व्यंजन

चूंकि इस पर्व को तिलकुटा चौथ भी कहा जाता है, इसलिए Tilakut Chauth 2026 के अवसर पर पारंपरिक खान-पान का विशेष महत्व है। यहाँ वे प्रमुख व्यंजन हैं जो इस दिन बनाए जाते हैं:

1. तिलकुट (Tilkut): तिलकुट इस पूजा का मुख्य प्रसाद है। इसे बनाने के लिए तिल को भूनकर और कूटकर उसमें गुड़ मिलाकर लड्डू बनाए जाते है।

2. शकरकंद (Sweet Potato): इसे भूनकर या उबालकर फलाहार के रूप में खाया जाता है।

3. तिल के लड्डू: पूजा के लिए तिल-गुड़ या तिल-खोया के लड्डू विशेष रूप से तैयार किए जाते हैं।

4. गुड़ की खीर: उत्तर भारत के कई हिस्सों में इस दिन चावल और गन्ने के रस या गुड़ से बनी खीर का भोग लगाया जाता है।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. 2026 में सकट चौथ कब है?

 यदि आप भी जानना चाहते है कि Sakat Chauth 2026 Mein Kab Hai, तो आपको बता दें कि पंचांग के अनुसार सकट चौथ माघ मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी 6 जनवरी 2026, मंगलवार को पड़ रही है। 

2. सकट चौथ पर गणेश पूजा कैसे करें?

इस दिन शाम को गणेश जी की विधिवत स्थापना करें। यदि आप भी यह खोज रहे है कि Sakat Chauth par Ganesh puja kaise karein, तो इसके लिए दूर्वा, तिलकुट और शकरकंद का भोग लगाकर 'संकट नाशन' मंत्र का जप करें और अंत में आरती करें।

3. सकट चौथ पर्व क्यों मनाया जाता है?

 श्रद्धालुओं के मन में अक्सर यह सवाल होता है कि Sakat Chauth kyu manayi jati hai? इसका मुख्य कारण धार्मिक और भावनात्मक है। यह व्रत संतान को हर तरह के संकटों से बचाने, उनकी दीर्घायु और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए मनाया जाता है।

4. सकट चौथ व्रत कब और कैसे खोलें?

इस दिन निर्जला उपवास रखा जाता है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह होता है कि Sakat Chauth Vrat Kab Toda Jata Hai? तो सही विधि यह है कि रात में चंद्रमा के उदय होने पर, उन्हें अर्घ्य दें और उसके बाद तिल-गुड़ का प्रसाद ग्रहण करके ही व्रत का समापन किया जाता है।

5. सकट चौथ को क्या दान करें?

 इस दिन सबसे पहले पंचांग में मुहूर्त देखें कि "Aaj sankashti chaturthi kitne baje tak hai" ताकि पूजा सही समय पर हो सके। पूजा के बाद दान का बहुत महत्व है। अगर आप सोच रहे हैं कि Sakat Chauth ke din kya daan karna chahiye, तो शास्त्रों के अनुसार तिल, गुड़ और गर्म वस्त्रों का दान करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

Book Your Anushthan
talkToAstrologer
Free Match Making
muhuratConsultation
DownloadKundli
Youtube
Facebook
Instagram
Astrologer
Talk to us