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सफला  एकादशी 2025

सफला एकादशी 2025


सफला एकादशी पौष माह के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एक महत्वपूर्ण एकादशी है, जो आमतौर पर दिसंबर या जनवरी में आती है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति को अपने सभी कार्यों में सफलता मिलती है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है और इसके पालन से पापों का नाश होता है, दरिद्रता दूर होती है, तथा सुख-समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है। साल 2025 में सफला एकादशी 15 दिसंबर, सोमवार को मनाई जाएगी। 

सफला एकादशी क्या है?

सफला एकादशी सनातन धर्म की प्रमुख एकादशियों में से एक है, जो पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को आती है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है और इसका अर्थ होता है – "सफलता देने वाली एकादशी"। इस दिन श्रद्धालु उपवास, ध्यान और पूजा करके अपने जीवन में पापों से मुक्ति और सुख-समृद्धि की प्राप्ति की कामना करते हैं।

सफला एकादशी 2025: तिथि और समय

सफला एकादशी पौष माह के कृष्ण पक्ष में आती है। साल 2025 में, यह एकादशी सोमवार, 15 दिसंबर, 2025 को मनाई जाएगी। 

सफला एकादशी तिथि: 15 दिसंबर 2025

तिथि का आरंभ: रविवार, 14 दिसंबर, 2025 को शाम 06:52 P.M बजे 

तिथि का समापन: सोमवार, 15 दिसंबर, 2025 को रात 09:22 P.M बजे

पारण का समय (व्रत तोड़ने का): मंगलवार, 16 दिसंबर, 2025 को सूर्योदय के बाद । 

सफला एकादशी की कथा

 चम्पावती नाम से विख्यात एक पुरी है, जो कभी राजा माहिष्मत की राजधानी थी। राजर्षि माहिष्मत के पाँच पुत्र थे। उनमें जो ज्येष्ठ था, वह सदा पाप कर्म में ही लगा रहता था। परस्त्रीगामी और वेश्यासक्त था। उसने पिता के धन को पाप कर्म में ही खर्च किया। वह सदा दुराचार परायण तथा ब्राह्मणों का निन्दक था। वैष्णवों और देवताओं की भी हमेशा निन्दा किया करता था। अपने पुत्र को ऐसा पापाचारी देखकर राजा माहिष्मत ने राजकुमारों में उसका नाम लुम्भक रख दिया। फिर पिता और भाइयों ने मिलकर उसे राज्य से बाहर निकाल दिया। लुम्भक उस नगर से निकल कर घने वन में चला गया। वहीं रहकर उस पापी ने प्रायः समूचे नगर का धन लूट लिया। एक दिन जब वह चोरी करने के लिये नगर में आया तो रात में पहरा देने वाले सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया। किन्तु जब उसने अपने को राजा माहिष्मत का पुत्र बतलाया तो सिपाहियों ने उसे छोड़ दिया। फिर वह पापी वन में लौट आया और प्रतिदिन मांस तथा वृक्षों के फल खाकर जीवन निर्वाह करने लगा। उस दुष्ट का विश्राम स्थान पीपल वृक्ष के निकट था। वहाँ बहुत वर्षों का पुराना पीपल का वृक्ष था। उस वन में वह वृक्ष एक महान् देवता माना जाता था। पापबुद्धि लुम्भक वहीं निवास करता था।

बहुत दिनों के पश्चात् एक दिन किसी संचित पुण्य के प्रभाव से उसके द्वारा एकादशी के व्रत का पालन हो गया। पौष मास में कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन पापिष्ठ लुम्भक ने वृक्षों के फल खाये और वस्त्रहीन होने के कारण रातभर जाड़े का कष्ट भोगा। उस समय न तो उसे नींद आयी और न आराम ही मिला। वह निष्प्राण-सा हो रहा था। सूर्योदय होने पर भी उस पापी को होश नहीं हुआ। 'सफला' एकादशी के दिन भी लुम्भक बेहोश पड़ा रहा। दोपहर होने पर उसे चेतना प्राप्त हुई। फिर इधर-उधर दृष्टि डाल कर वह आसन से उठा और लँगड़े की भाँति पैरों से बार-बार लड़खड़ाता हुआ वन के भीतर गया। वह भूख से दुर्बल और पीड़ित हो रहा था। राजन् ! उस समय लुम्भक बहुत-से फल लेकर ज्यों ही विश्राम-स्थान पर लौटा, त्यों ही सूर्यदेव अस्त हो गये। तब उसने वृक्ष की जड़ में बहुत-से फल निवेदन करते हुए कहा - 'इन फलों से लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु संतुष्ट हों।' यों कहकर लुम्भक ने रातभर नींद नहीं ली। इस प्रकार अनायास ही उसने इस व्रत का पालन कर लिया। उस समय सहसा आकाशवाणी हुई- 'राजकुमार ! तुम सफला एकादशी के प्रसाद से राज्य और पुत्र प्राप्त करोगे।' 'बहुत अच्छा' कहकर उसने वह वरदान स्वीकार किया। इसके बाद उसका रूप दिव्य हो गया। तब से उसकी उत्तम बुद्धि भगवान् विष्णु के भजन में लग गयी। दिव्य आभूषणों की शोभा से सम्पन्न होकर उसने अकण्टक राज्य प्राप्त किया और पंद्रह वर्षों क वह उसका संचालन करता रहा। उस समय भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से उसके मनोज्ञ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। जब वह बड़ा हुआ, तब लुम्भक ने तुरंत ही राज्य की ममता छोड़कर उसे पुत्र को सौंप दिया और वह भगवान् श्रीकृष्ण के समीप चला गया, जहाँ जाकर मनुष्य कभी शोक में नहीं पड़ता। राजन्! इस प्रकार जो सफला एकादशी का उत्तम व्रत करता है, वह इस लोक में सुख भोगकर मरने के पश्चात् मोक्ष को प्राप्त होता है। संसार में वे मनुष्य धन्य हैं, जो 'सफला' एकादशी के व्रत में लगे रहते हैं। उन्हींका जन्म सफल है। महाराज! इसकी महिमा को पढ़ने, सुनने तथा उसके अनुसार आचरण करने से मनुष्य राजसूय यज्ञ का फल पाता है।

सफला एकादशी पूजा 2025: अनुष्ठान

पौष मास के शुक्ल पक्ष में दशमी के उत्तम दिन को श्रद्धा युक्त चित्त से प्रातः काल स्नान करें। फिर मध्याहन काल में स्नान करके एकाग्र चित्त हो एक समय भोजन करें तथा रात्रि में भूमि पर सोए। रात के अंत में निर्मल प्रभात होने पर एकादशी के दिन नित्यकर्म करके स्नान करे। इसके बाद भक्ति भाव से निम्नांकित मंत्र पढ़ते हुए उपवास का नियम ग्रहण करें-

अद्य स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः।

श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं में भवाच्युत।।

कमलनयन भगवान, नारायण! आज मैं सब भोगों से अलग हो निराहार रहकर कल भोजन करूंगा। अच्युत ! आप मुझे शरण दे। फिर धूप और गंध आदि से भगवान हरीकेश का पूजन करके रात्रि में उनके समीप जागरण करे। तत्पश्चात सवेरा होने पर द्वादशी के दिन पुन: भक्ति पूर्वक श्री हरि की पूजा करें। उसके बाद ब्राह्मणों को भोजन करा कर भाई- बंधु, नाती और पुत्र आदि के साथ स्वयं मौन होकर भोजन करें।

सफला एकादशी 2025: लाभ

• सफला एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को अपने सभी कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।

• यह व्रत समस्त पापों का नाश करता है और दरिद्रता को दूर कर धन-समृद्धि प्रदान करता है।

• जो भक्त सच्चे मन से यह व्रत करते हैं, उनकी सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। 

• सफला एकादशी का व्रत अंततः मोक्ष की प्राप्ति में सहायक माना जाता है। 

• इस व्रत के प्रभाव से जीवन में सुख, शांति और सकारात्मकता आती है। 

• यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है, इसलिए इसे करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

सफला एकादशी 2025: पूजा विधि

1. दशमी तिथि को तैयारी:

• एकादशी व्रत की शुरुआत दशमी तिथि से होती है।

• दशमी तिथि को एक समय सात्विक भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।

• मन, वचन और कर्म से पवित्र रहें।

2. प्रातःकाल स्नान और संकल्प:

• एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें।

• स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

• भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत और पूजा का संकल्प लें:

"मैं श्रीहरि विष्णु की कृपा प्राप्ति हेतु साफला एकादशी का व्रत करता/करती हूँ, कृपया इसे सफल करें।"

3. पूजा स्थल की तैयारी:

• पूजा के लिए लकड़ी या चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं।

• भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।

4. भगवान विष्णु की पूजा करें:

• भगवान विष्णु को पीले फूल, तुलसी दल, धूप, दीप, चंदन, रोली, और सुगंधित जल अर्पित करें।

• नैवेद्य में फल, मिष्ठान्न, दूध, पंचामृत आदि अर्पण करें।

विष्णु सहस्रनाम या विष्णु स्तो त्र का पाठ करें।

5. व्रत का नियम:

• पूरे दिन व्रती को उपवास करना चाहिए ।

• दिनभर भगवान विष्णु के भजन, कीर्तन और कथा श्रवण करें।

• रात्रि को जागरण करना पुण्यकारी माना गया है।

6. द्वादशी को पारण:

• अगली सुबह द्वादशी तिथि को ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन और दान देकर व्रत का पारण करे।

सफला एकादशी 2025: मंत्र जप

• मंत्र: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

अर्थ: मैं भगवान वासुदेव को नमस्कार करता हूँ और उनका शरणागत होता हूँ।

लाभ: इस मंत्र के नियमित जप से जीवन में शांति, सुरक्षा, और विष्णु भगवान की कृपा प्राप्त होती है। 

• मंत्र: ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥

अर्थ : हम नारायण भगवान को जानें, वासुदेव को ध्यान में रखें, और वह विष्णु हमें सद्बुद्धि प्रदान करें।

लाभ: इस मंत्र से बुद्धि और निर्णय शक्ति का विकास होता है।

सफला एकादशी 2025: महत्त्व

सफला एकादशी का शाब्दिक अर्थ है – सफलता देने वाली एकादशी। यह एकादशी उन लोगों के लिए विशेष रूप से फलदायी मानी जाती है जो अपने जीवन में सफलता, शांति और आध्यात्मिक उन्नति की कामना रखते हैं। इस दिन व्रत, पूजा और भगवान विष्णु का नामस्मरण करने से नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और मन, बुद्धि तथा कर्म शुद्ध होते हैं। मान्यता है कि सफला एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के सभी कार्य सफल होते हैं और भाग्य में सकारात्मक परिवर्तन आता है। यह एकादशी साधना, आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि का श्रेष्ठ अवसर मानी जाती है।

सफला एकादशी 2025: धार्मिक महत्व

धार्मिक दृष्टि से सफला एकादशी का स्थान अत्यंत उच्च माना गया है। पद्म पुराण और भविष्य पुराण जैसे ग्रंथों में इसका विशेष उल्लेख मिलता है। इनमें वर्णित कथा के अनुसार, लूम्भक नामक अधर्मी राजपुत्र ने अनजाने में इस व्रत का पालन किया और भगवान विष्णु की कृपा से उसका जीवन परिवर्तित हो गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि इस एकादशी का व्रत व्यक्ति को पापों से मुक्त करके धर्म, धन और मोक्ष की प्राप्ति कराता है। शास्त्रों में कहा गया है कि सफला एकादशी का पुण्य सहस्रों यज्ञों और दान के बराबर होता है। यह दिन विष्णुभक्तों के लिए मोक्ष का द्वार खोलने वाला माना गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. सफला एकादशी किस राज्य में मनाई जाती है?

सफला एकादशी भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और ओडिशा जैसे राज्यों में श्रद्धा से मनाई जाती है। यह व्रत विशेष रूप से वैष्णव परंपरा से जुड़े भक्तों द्वारा रखा जाता है।

2. हम सफला एकादशी क्यों मनाते हैं?

हम सफला एकादशी इसलिए मनाते हैं क्योंकि यह व्रत पापों का नाश करता है और भगवान विष्णु की कृपा से सफलता, सुख-शांति व मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत धर्म, भक्ति और आत्मशुद्धि का प्रतीक है।

3. सफला एकादशी पर क्या करें?

सफला एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा करें, व्रत रखें, व्रत कथा सुनें, मंत्र जप करें और सात्विक भोजन ग्रहण करें। इस दिन दान-पुण्य करें, रात्रि में जागरण करें और संयमपूर्वक आचरण करें।

4. घर पर सफला एकादशी पूजा कैसे करें?

सफला एकादशी के दिन प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लें। घर के पूजास्थल को स्वच्छ कर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र को स्थापित करें। उन्हें गंगाजल से शुद्ध करें, पीले पुष्प, तुलसीदल, धूप-दीप, और पंचामृत अर्पित करें। विष्णु सहस्त्रनाम या "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जप करें। दिनभर व्रत रखें और केवल फलाहार करें। शाम को पुनः पूजा करके एकादशी व्रत कथा सुनें। अगले दिन द्वादशी को व्रत पारण करें और ज़रूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या दक्षिणा का दान करें।

5. सफला एकादशी की पूजा कैसे करें?

सफला एकादशी पर प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा करें, तुलसीदल अर्पित करें, व्रत कथा सुनें, मंत्र जप करें, फलाहार करें और अगले दिन द्वादशी को व्रत का विधिवत पारण करें।

6. सफला एकादशी 2025 में कब शुरू होगी?

सफला एकादशी 2025 में सोमवार, 15 दिसंबर को मनाई जाएगी। तिथि 14 दिसंबर शाम 6:52 P.M से 15 दिसंबर रात 9:22 P.M तक रहेगी। व्रत का पारण 16 दिसंबर को सूर्योदय के बाद किया जाएगा।

7. सफला एकादशी पर क्या नहीं करना चाहिए?

• अन्न और तामसिक भोजन न करें। 

• झूठ, क्रोध और अपशब्दों से बचें। 

• दिन में सोना निषिद्ध है। 

• किसी भी जीव या व्यक्ति को कष्ट न दें। 

• ब्रह्मचर्य का पालन करे। 

8. सफला एकादशी के दिन क्या करना चाहिए?

• प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें। 

• भगवान विष्णु की पूजा करें। 

• व्रत रखें व फलाहार करें।  

• विष्णु मंत्र जप व कथा श्रवण करें। 

• दान-पुण्य करें और रात्रि जागरण करें। 

9. इसे सफला एकादशी क्यों कहा जाता है?

सफला एकादशी को ‘सफला’ इसीलिए कहा जाता है क्योंकि यह व्रत जीवन में सफलता, पुण्य और मोक्ष प्रदान करता है। ‘सफला’ शब्द का अर्थ है "सफलता दिलाने वाली", और यह एकादशी व्रत धार्मिक, आध्यात्मिक और सांसारिक सफलताओं की प्राप्ति में सहायक मानी गई है।

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