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परिवर्तिनी एकादशी 2025

परिवर्तिनी एकादशी 2025 

परिवर्तिनी एकादशी, जिसे पद्मा और पार्श्व एकादशी भी कहा जाता है, भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। यह पर्व भगवान विष्णु के पार्श्व परिवर्तन का प्रतीक है और चातुर्मास के प्रमुख पर्वों में से एक है। वर्ष 2025 में यह एकादशी 03 सितम्बर को मनाई जाएगी। इस दिन व्रत, कथा, पूजा और दान से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। 

 परिवर्तिनी एकादशी 2025: तिथि एवं समय 

 परिवर्तिनी एकादशी 2025 में बुधवार, 03 सितम्बर 2025 को मनाई जाएगी। 

  • एकादशी तिथि प्रारम्भ: 03 सितम्बर 2025, प्रातः 03:55 A.M बजे 
  • एकादशी तिथि समाप्त: 04 सितम्बर 2025, प्रातः 04:23 A.M बजे 
  • व्रत पारण का समय: 04 सितम्बर 2025, सूर्योदय के बाद 

परिवर्तिनी एकादशी की कथा 

प्राचीन काल में सूर्यवंशीय राजा मान्धाता अत्यंत धर्मपरायण और प्रजापालक राजा थे। उनके राज्य में प्रजा सुखी थी, लेकिन एक समय ऐसा आया कि तीन वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। इससे प्रजा भूख-प्यास से त्रस्त हो उठी। राजा ने तपस्वी अंगिरा ऋषि से इसका कारण पूछा। ऋषि ने बताया कि राज्य में एक शूद्र तप कर रहा है जिससे धर्म की व्यवस्था बाधित हुई है। 

राजा ने दंड देने के बजाय एक वैकल्पिक मार्ग मांगा। तब ऋषि ने उन्हें भाद्रपद शुक्ल एकादशी का व्रत करने का उपदेश दिया, जिसे पद्मा या परिवर्तिनी एकादशी कहते हैं। राजा ने प्रजा सहित इस व्रत का पालन किया और वर्षा प्रारंभ हो गई, जिससे समस्त संकट समाप्त हो गए। यह कथा दर्शाती है कि व्रत, श्रद्धा और भक्ति से असंभव भी संभव हो सकता है। 

परिवर्तिनी एकादशी: अनुष्ठान 

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में दशमी के उत्तम दिन को श्रद्धायुक्त चित्त से प्रातः काल स्नान करें। फिर मध्याहन काल में एकाग्र चित्त हो एक समय भोजन करें तथा रात्रि में भूमि पर सोए रात के अंत में निर्मल प्रभात होने पर एकादशी के दिन नित्यकर्म करके स्नान करे, इसके बाद भक्ति भाव से निम्नांकित मंत्र पढ़ते हुए उपवास का नियम ग्रहण करें- 

अद्य स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः। 

श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं में भवाच्युत।। 

कमलनयन भगवान, नारायण! आज मैं सब भोगों से अलग हो निराहार रहकर कल भोजन करूंगा। अच्युत ! आप मुझे शरण दें। फिर धूप और गंध आदि से भगवान नारायण का पूजन करके रात्रि में उनके समीप जागरण करें। तत्पश्चात सवेरा होने पर द्वादशी के दिन पुन: भक्ति पूर्वक श्री हरि की पूजा करें। उसके बाद ब्राह्मणों को भोजन करा कर भाई- बंधु, नाती और पुत्र आदि के साथ स्वयं मौन होकर भोजन करें। 

परिवर्तिनी एकादशी के लाभ 

1) इस व्रत से सभी पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। 

2) पुराणों के अनुसार व्रती को स्वर्ग की प्राप्ति होती है और आत्मा को शुद्धि मिलती है। 

3) यह व्रत चातुर्मास के अंतर्गत आता है, इसलिए इसका पुण्यफल अत्यंत विशेष होता है। 

4) नियमित उपवास करने से मानसिक शांति और आंतरिक स्थिरता प्राप्त होती है। 

5) व्रत से शरीर और मन दोनों का शुद्धिकरण होता है, जिससे स्वास्थ्य में सुधार होता है। 

6) मनोबल बढ़ता है और व्यक्ति आत्म-नियंत्रण की भावना को विकसित करता है। 

7) आर्थिक रूप से यह व्रत धन-धान्य और समृद्धि को आकर्षित करता है। 

8) जिन दंपत्तियों को संतान की इच्छा हो, उन्हें यह व्रत करने से संतान सुख की प्राप्ति की मान्यता है। 

9) यह व्रत वैवाहिक जीवन में सामंजस्य और सौहार्द बनाए रखने में सहायक होता है। 

10) भक्तिभाव से किया गया यह व्रत परिवार में शांति और सकारात्मक ऊर्जा लाता है। 

11) घर में धार्मिक वातावरण बनता है और पारिवारिक सदस्य आध्यात्मिक रूप से जुड़ते हैं। 

12) यह व्रत श्रद्धा, भक्ति और आत्मबल को सुदृढ़ करता है, जिससे जीवन में संतुलन आता है। 

परिवर्तिनी एकादशी की पूजा विधि  

A. व्रत का संकल्प और प्रारंभ 

a) प्रातःकाल उठकर स्नान करें और शुद्ध वस्त्र धारण करें। 

b) भगवान श्रीविष्णु अथवा उनके वामन रूप को प्रणाम करें। 

c) पूरी श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत का संकल्प लें। 

B. पूजन सामग्री का प्रयोग 

a) भगवान को तुलसी दल और पीले पुष्प अर्पित करें। 

b) घी का दीपक जलाएं और अगरबत्ती प्रज्वलित करें। 

c) यदि शालिग्राम (शक्लिंग) विद्यमान हो, तो पंचामृत से उनका अभिषेक करें। 

C. माता लक्ष्मी और तुलसी पूजन 

a) श्रीहरि विष्णु के साथ-साथ माता लक्ष्मी और तुलसी देवी की भी पूजा करें। 

b) तुलसी पर दीपक रखें और मंत्रों के साथ पूजन करें। 

D. प्रसाद में क्या अर्पित करें 

a) प्रसाद के रूप में फल, पान, सुपारी, मिश्री आदि भगवान को अर्पित करें। 

b) इन सात्विक पदार्थों को बाद में व्रती स्वयं ग्रहण कर सकते हैं। 

E. उपवास नियम 

a) व्रत के दौरान अन्न का त्याग करें। 

b) केवल फल, दूध, जल, गन्ने का रस अथवा फलाहार लें। 

c) निर्जला व्रत रखने की सामर्थ्य हो तो वह सर्वोत्तम माना जाता है। 

F. दिनभर भक्ति में रहें 

a) पूरे दिन भगवान विष्णु का स्मरण करें। 

b) “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें। 

c) विष्णु सहस्रनाम, गीता पाठ या वामन स्तोत्र का पाठ करें। 

G. संध्या पूजन और आरती 

a) शाम को दीपक जलाकर भगवान की परिवार सहित आरती करें। 

b) तुलसी के समीप दीप रखें और शंखनाद करें। 

H. भजन-कीर्तन और जागरण 

a) रात में सामूहिक भजन-कीर्तन करें और धर्म चर्चा में सहभागी बनें। 

b) रात्रि जागरण का विशेष महत्व है, सोने से परहेज करें। 

I. द्वादशी तिथि में व्रत पारण (04 सितम्बर 2025) 

a) अगली सुबह (द्वादशी तिथि को) पुनः स्नान करके भगवान की पूजा करें। 

b) ब्राह्मण, गाय, निर्धनों, बच्चों या विधवाओं को अन्न, वस्त्र, दक्षिणा का दान करें। 

c) सूर्योदय के बाद उचित समय पर पारण करें — अर्थात व्रत समाप्त करें। 

d) पारण के लिए सात्विक भोजन करें, जैसे खिचड़ी, फल, दूध, या हल्का अन्न। 

परिवर्तिनी एकादशी के मंत्र जप 

प्रमुख मंत्र: 

 “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” 

“हरे कृष्ण हरे कृष्ण, हरे राम हरे राम” 

लाभ: 

1. मानसिक शांति एवं आत्मशुद्धि 

2. नकारात्मकता का नाश 

3. आध्यात्मिक उन्नति 

4. भगवान विष्णु की कृपा प्राप्ति 

परिवर्तिनी एकादशी का महत्व 

1. भगवान विष्णु का पार्श्व परिवर्तन: इस दिन भगवान विष्णु अपनी योगनिद्रा की स्थिति में बाएँ पार्श्व से दाएँ पार्श्व पर करवट बदलते हैं, जिसे धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ और परिवर्तनकारी माना गया है। 

2. चातुर्मास के मध्य का विशेष दिन: यह पर्व चातुर्मास के मध्य में आता है और इसे नए आध्यात्मिक आरंभ और आत्मचिंतन का प्रतीक माना जाता है। 

3. कथा श्रवण का पुण्यफल: मान्यता है कि इस दिन भगवान की कथा सुनने या पढ़ने मात्र से भी पापों का शमन होता है और मनुष्य के दोषों का नाश होता है। 

4. वामन जयंती का शुभ योग: भाद्रपद शुक्ल पक्ष की द्वादशी को वामन जयंती होती है, जो भगवान विष्णु के वामन अवतार के प्रकट होने का पर्व है। 

5. बलि-वामन प्रसंग से जुड़ी महत्ता: मान्यता है कि परिवर्तिनी एकादशी के अगले दिन ही भगवान वामन ने राजा बलि से तीन पग भूमि माँगकर तीनों लोकों को नाप लिया और अहंकार का विनाश किया। 

6. धर्म स्थापना का प्रतीक पर्व: यह दिन धर्म की स्थापना, पाप विनाश और ईश्वरीय न्याय का संदेश देता है। 

7. परिवर्तिनी एकादशी और वामन जयंती का संबंध: यह दोनों पर्व धार्मिक रूप से आपस में गहराई से जुड़े हैं, जो भक्तों को सत्कर्म, श्रद्धा और भक्ति की प्रेरणा देते हैं। 

परिवर्तिनी एकादशी की महत्ता 

1. परिवर्तिनी एकादशी की महत्ता का वर्णन ब्रह्मविवर्त, पद्म और स्कंद पुराण जैसे कई धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। 

2. ब्रह्मविवर्त पुराण के अनुसार इस व्रत से अश्वमेध यज्ञ के बराबर पुण्य फल की प्राप्ति होती है। 

3. श्रीमद्भागवत गीता में भी इस दिन व्रत-पूजन को आत्मिक शुद्धि का माध्यम बताया गया है। 

4. इस व्रत से व्यक्ति के पूर्वजों का उद्धार होता है और पितरों की शांति प्राप्त होती है। 

5. जो भक्त विश्वास और नियमपूर्वक व्रत करता है, उसके सभी दुख और दोष नष्ट हो जाते हैं। 

6. यह व्रत चातुर्मास के मध्य आने के कारण विशेष पुण्यदायक और फलदायी माना गया है। 

7. यह दिन भगवान विष्णु के पार्श्व परिवर्तन (करवट बदलने) का पर्व है, जिससे जीवन में शुभता आती है। 

8. व्रत करने से सुख-शांति, समृद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। 

9. पारिवर्तिनी एकादशी को सभी एकादशियों में विशेष और श्रेष्ठ माना गया है। 

10. इस दिन किया गया दान, जप, तप और सेवा कई गुना फल देने वाला होता है। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) 

1. परिवर्तिनी एकादशी का व्रत किस राज्य में मनाया जाता है? 

a) परिवर्तिनी एकादशी दक्षिण भारत (कर्नाटक, तमिलनाडु): मूर्ति को करवट बदलते हैं।  

b) उत्तर भारत (मथुरा, वृंदावन): तुलसी और कमल अर्पण ।  

c) गुजरात, महाराष्ट्र: वामन कथा और तुलसी पूजा ।  

2. परिवर्तिनी एकादशी क्यों मनाई जाती है? 

परिवर्तिनी एकादशी भाद्रपद शुक्ल पक्ष की उस तिथि पर मनाई जाती है जब चातुर्मास में योगनिद्रा में स्थित भगवान श्रीविष्णु पार्श्व परिवर्तन करते हैं, अर्थात् वे अपने शयन की करवट बदलते हैं। यह परिवर्तन अध्यात्मिक जागरण, धर्म की पुनः स्थापना और नए शुभ चरण के आरंभ का प्रतीक माना जाता है।
इस दिन व्रत और भक्ति से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है, तथा यह व्रत मोक्षदायक एवं पापनाशक माना गया है। कोई भी स्त्री-पुरुष, गृहस्थ या ब्रह्मचारी श्रद्धा से रख सकता है।  

3. घर पर परिवर्तिनी एकादशी का व्रत कैसे करें? 

1) पूजा स्थल के पास तुलसी का पौधा रखें और उसे जल अर्पित करें, साथ ही शाम को तुलसी के समीप दीपक जलाएँ। 

2) भगवान विष्णु को पीले फूल, फल, मिठाई (नैवेद्य) और तुलसी दल अर्पित कर श्रद्धापूर्वक पूजा करें। 

3) व्रत का संकल्प लेकर दिनभर फलाहार या निर्जला उपवास रखें तथा सात्विकता बनाए रखें। 

4) परिवार के साथ परिवर्तिनी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या श्रवण करें और भगवान के नाम का संकीर्तन करें। 

5) पूरे दिन “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें या श्री विष्णु सहस्रनाम, वामन स्तोत्र, अथवा श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करें। 

6) संध्या को दीप जलाकर भगवान की आरती करें और भजन-कीर्तन के साथ रात्रि जागरण करने का प्रयास करें। 

7) द्वादशी को प्रातः स्नान कर पुनः पूजन करें और ब्राह्मण, गाय, निर्धन या बच्चों को अन्न, वस्त्र, दक्षिणा दान देकर व्रत का पारण करें। 

4. परिवर्तिनी एकादशी पर पूजा कैसे करें? 

1) प्रातः स्नान करके शुद्ध पीले वस्त्र पहनें और भगवान विष्णु का ध्यान करें। 

2) पूजन में तुलसी दल, पीले फूल, चावल, कुमकुम, चंदन और घी का दीपक अर्पित करें। 

3) पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से भगवान विष्णु या शालिग्राम का अभिषेक करें। 

4) विष्णु सूक्त, वामन स्तोत्र या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें और संध्या को आरती करें। 

5) रात्रि में भजन-कीर्तन करें या गीता पाठ द्वारा ईश्वर की भक्ति में रात्रि जागरण करें। 

5. परिवर्तिनी एकादशी 2025 कब शुरू होगी? 

2025 में परिवर्तिनी एकादशी का व्रत बुधवार, 03 सितम्बर 2025 को रखा जाएगा। इस दिन एकादशी तिथि का आरंभ सुबह 3:55 बजे से हो रहा है, जो कि 04 सितम्बर 2025 को सुबह 4:23 बजे तकरहेगी।  

6. एकादशी व्रत में क्या नहीं करना चाहिए? 

1) तामसिक और नकारात्मक प्रवृत्ति वाली वस्तुओं का पूर्णतः त्याग करें। 

2) दिनभर शुभ और सात्विक विचारों में मन लगाएँ; कलह या कटु वचन से बचें। 

3) शरीर, वाणी और मन में संयम तथा शुद्धता बनाए रखें। 

4) शारीरिक संयम (ब्रह्मचर्य) का पालन विशेष रूप से आवश्यक है। 

5) भोग-विलास और उत्सव जैसे भौतिक आकर्षणों से दूर रहें। 

7. एकादशी के दिन क्या करना चाहिए? 

1) व्रत के साथ भगवान विष्णु की पूजा, पाठ, कथा और आरती-कीर्तन करें। 

2) दिनभर मंत्र-जप, ध्यान और आत्मिक साधना में मन लगाएँ। 

3) परिवार के साथ मिलकर भक्ति कार्यों में सहभागी बनें। 

4) ज़रूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या दक्षिणा देकर पुण्य अर्जित करें। 

5) व्यर्थ कार्यों से बचकर दिन को ईश्वर-भक्ति में समर्पित करें। 

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