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 पापांकुशा एकादशी 2025

पापांकुशा एकादशी 2025

सनातन धर्म में एकादशी का व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। हर एकादशी का अपना विशेष महत्व और कथा होती है, जो भक्तों को भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने और आध्यात्मिक उन्नति करने का अवसर प्रदान करती है। इन्हीं में से एक है पापांकुशा एकादशी, जो आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में आती है और दशहरे के ठीक बाद मनाई जाती है । यह एकादशी विशेष रूप से भगवान विष्णु को समर्पित है, जो इस सृष्टि के पालनहार हैं । 

'पापांकुशा' शब्द दो शब्दों, 'पाप' और 'अंकुश' (नियंत्रण) से मिलकर बना है। इसका शाब्दिक अर्थ है 'पाप पर अंकुश लगाना' या 'पापों को नियंत्रित करने वाली एकादशी' । यह नाम इस व्रत के मूल उद्देश्य को स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि यह व्यक्ति के संचित पापों को समाप्त करने की शक्ति रखता है, और साथ ही उसे भविष्य में पाप कर्म करने से रोकने के लिए एक आध्यात्मिक नियंत्रण भी प्रदान करता है । यह केवल पश्चाताप का मार्ग नहीं है, बल्कि एक ऐसा अनुशासन है जो व्यक्ति को धर्म के मार्ग पर स्थिर रहने और अपनी इंद्रियों व विचारों पर नियंत्रण स्थापित करने में सहायता करता है। 

पापांकुशा एकादशी पर्व क्या है?

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पापंकुशा या वैष्णव पापंकुशा एकादशी कहते है। पापांकुशा एकादशी को कई लोग पापांकुसा एकादशी के नाम से भी जानते हैं। 'गौण' का अर्थ है - मुख्य के बाद आने वाला। चूंकि यह व्रत दशहरे के तुरंत बाद आता है और नवरात्रि-दशहरा जैसे प्रमुख पर्वों की समाप्ति के बाद मनाया जाता है, इसलिए कुछ परंपराओं में इसे ‘गौण पापांकुशा एकादशी’ के नाम से भी जाना जाता है। यह सब पापों को हरने वाली तथा उत्तम है। इस दिन भक्तजन भगवान विष्णु की पूजा कर सभी पापों से मुक्ति पाने और मोक्ष की प्राप्ति हेतु व्रत रखते हैं। यह
एकादशी खासतौर पर पुण्य अर्जन, पूर्वजों के उद्धार और आत्मा की शुद्धि के लिए मानी जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है और वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति होती है।
 

पापांकुशा एकादशी तिथि, समय 2025- 3 अक्टूबर 2025   

एकादशी तिथि प्रारंभ: 2 अक्टूबर 2025, गुरुवार को शाम 7:13 बजे     

एकादशी तिथि समाप्त: 3 अक्टूबर 2025, शुक्रवार को शाम 6:34 बजे तक     

पारण का समय: 4 अक्टूबर 2025 शनिवार को सूर्योदय के बाद      

व्रत उपवास तिथि: 3 अक्टूबर 2025 शुक्रवार    

पापांकुशा एकादशी कथा

पापांकुशा एकादशी की पवित्र कथा का वर्णन स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के समय धर्मराज युधिष्ठिर से किया था। जब युधिष्ठिर ने भगवान से आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी के नाम, पूजन विधि और फल के बारे में पूछा, तब श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया – "यह एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली है और इसे पापांकुशा एकादशी कहा जाता है।" 

a) कथा का सारांश 

वृंदावन क्षेत्र के निकट विंध्याचल पर्वत पर क्रोधन नाम का एक अत्यंत क्रूर और पापी बहेलिया रहता था। उसका जीवन हिंसा, चोरी, डकैती, झूठ, मद्यपान और हत्या जैसे घोर अपराधों में लिप्त था। उसने जीवन भर कभी धर्म का पालन नहीं किया था। लेकिन जैसे-जैसे उसकी आयु ढलने लगी, उसे अपने पापों का स्मरण होने लगा। मृत्यु समीप जानकर वह नरक की कल्पना मात्र से कांपने लगा। एक दिन जब यमदूत उसे लेने आए, तभी उसकी मुलाकात जंगल में तपस्या कर रहे महर्षि अंगिरा से हुई। क्रोधन ने डरते हुए ऋषि से पूछा – “हे मुनिवर! क्या मेरे जैसे पापी को भी कोई मुक्ति मिल सकती है?” ऋषि अंगिरा ने करुणा पूर्वक कहा – “यदि तुम सच्चे हृदय से अश्विन शुक्ल एकादशी, जिसे पापांकुशा एकादशी कहते हैं, का व्रत करो और भगवान विष्णु का पूजन करो, तो तुम अपने समस्त पापों से मुक्त हो सकते हो।” क्रोधन ने जीवन में पहली बार श्रद्धा और भक्ति के साथ उस एकादशी का व्रत किया, उपवास रखा, रात्रि जागरण किया और भगवान पद्मनाभ की सच्चे मन से पूजा की। 

b) व्रत का फल 

जब उसकी मृत्यु का समय आया, यमदूत फिर से आए - लेकिन इस बार दृश्य बदल चुका था। अब यमदूतों के स्थान पर भगवान विष्णु के पार्षद आए, जिन्होंने दिव्य रथ में बैठकर क्रोधन को वैकुंठ धाम की ओर ले गए। यमदूत यह देख अचंभित रह गए और खाली हाथ लौट गए। 

पापांकुशा एकादशी के अनुष्ठान

इस दिन भक्तों द्वारा ये अनुष्ठान किए जाते हैं:

  • ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें। 
  • भगवान विष्णु की मूर्ति को गंगाजल से स्नान कराएं। 
  • पीले वस्त्र पहनाकर उन्हें पीले फूल, तुलसी, पंचामृत और भोग अर्पित करें। 
  • विष्णु सहस्रनाम, श्रीमद्भगवद्गीता पाठ या वामन स्तोत्र का पाठ करें। 
  • रात्रि में जागरण करें और अगले दिन पारण करें। 

पापांकुशा एकादशी के लाभ

1) इस व्रत से सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। 

2) उपवास करने से मनुष्य को स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति होती है। 

3) भगवान पद्मनाभ (विष्णु) की पूजा से मनोरथ सिद्धि होती है। 

4) इस दिन केवल चंद्रमा को प्रणाम करने से हीकठोर तपस्या के समान फल मिलता है। 

5) तीर्थों और मंदिरों के दर्शन का फल केवल विष्णु नाम स्मरण से प्राप्त होता है। 

6) एकादशी व्रत से यमलोक की यातना नहीं सहनी पड़ती। 

7) यह व्रत करने वाला मातृ, पितृ और पत्नी पक्ष की 10-10 पीढ़ियोंका उद्धार करता है। 

8) व्रती अंत में चतुर्भुज रूप में विष्णु लोक को प्राप्त करता है। 

9) इस दिन दान (स्वर्ण, भूमि, गौ, अन्न, तिल, जूते, छाते आदि) करने से यमराज का दर्शन भी नहीं होता। 

10) उपवास और रात्रि जागरण करने से विष्णु धाम की प्राप्ति सहज हो जाती है। 

पापांकुशा एकादशी: पूजा विधि

  • प्रातःकाल उठकर स्नान करें और भगवान विष्णु का ध्यान करें। 
  • व्रत का संकल्प लेकर दीप प्रज्वलित करें। 
  • भगवान को तिल, फल, तुलसी, पंचामृत, और पीले पुष्प अर्पित करें। 
  • कथा पढ़ें या सुनें । 
  • दिनभर उपवास रखें और मन में भगवान विष्णु का जप करें। 
  • रात को जागरण करें और भक्ति गीत सुनें। 

पापांकुशा एकादशी 2025: मंत्र जप

इस दिन निम्न मंत्रों का जाप विशेष फलदायक माना जाता है:

  • "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"  
  • "श्री विष्णवे नमः" 
  • "ॐ नारायणाय नमः" 
  • श्री विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। 

पापांकुशा एकादशी का महत्व

1) यह एकादशी अश्विन मास के शुक्ल पक्ष में आती है और वर्ष की पावन एकादशियों में से एक है। 

2) यह दिन भगवान गरुड़ध्वज विष्णु की उपासना के लिए अत्यंत पुण्यदायक है। 

3) उपवास करने वाले को तीर्थ स्नान, यज्ञ, जप, होम, ध्यानका समान फल मिलता है। 

4) इस दिन किया गया ध्यान, स्नान, जप और दान बहु गुना पुण्यदायक होता है। 

5) यह व्रत मनुष्य को अग्नि, जल, वायु और यम के भय से मुक्त करता है। 

6) यह व्रत अशुभ ग्रहों, रोगों और दरिद्रता से मुक्ति दिलाने वाला है। 

7) पापांकुशा एकादशी विष्णु-शिव भक्ति समन्वय का संदेश देती है – दोनों देवों की निंदा वर्जित है। 

8) यह व्रत मन, वाणी और शरीर की शुद्धि के लिए अत्यंत प्रभावी है। 

पापांकुशा एकादशी की विशेषता

1) इसे गौण एकादशी, वैष्णव एकादशी और पापांकुसा एकादशी के नाम से जाना जाता है। 

2) यह एकादशी सभी पापों को नष्ट करने वाली मानी जाती है। 

3) इस दिन केवल विष्णु का स्मरण करने से सभी तीर्थों का फल प्राप्त हो जाता है। 

4) व्रती का अंत में रूप दिव्य होता है – पीतांबर धारी, हार से सुसज्जित, गरुड़ वाहन युक्त। 

5) यह एकादशी धन, सुंदर स्त्री, मित्र और आरोग्यता प्रदान करने वाली है। 

6) दरिद्र व्यक्ति भी यदि इस दिन यथाशक्ति व्रत, स्नान व दान करे, तो उसका जीवन सफल हो जाता है। 

7) यह व्रत करने से मनुष्य को पिछले जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है। 

8) यह एकादशी पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति दिलाने वाली मानी गई है। 

  

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. पापांकुशा एकादशी किस राज्य में मनाई जाती है?

यह व्रत भारत के सभी राज्यों में श्रद्धा से मनाया जाता है, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक में व्यापक रूप से इसका पालन होता है। 

2. हम पापांकुशा एकादशी क्यों मनाते हैं?

इस एकादशी को पापों से मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति के उद्देश्य से मनाया जाता है। यह भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ माध्यम है। 

3. पापांकुशा एकादशी पर क्या करें?

· उपवास रखें  

· विष्णु पूजा करें 

· तुलसी दल अर्पित करें 

· मंत्र जप करें 

· कथा श्रवण करें 

· रात्रि जागरण करें 

4. घर पर पापांकुशा एकादशी कैसे करें?

· घर की सफाई करें 

· मंदिर में दीपक जलाएं 

· विष्णु जी को पीले फूल और भोग अर्पित करें 

· कथा पढ़ें और मन में भगवान का स्मरण करें 

5. पापांकुशा एकादशी की पूजा कैसे करें? 

· प्रातः स्नान कर शुद्ध होकर पूजा स्थान पर बैठें 

· विष्णु जी की प्रतिमा पर जल, फूल, धूप, दीप, नैवेद्य अर्पित करें 

· व्रत कथा पढ़ें और आरती करें 

6. 2025 में पापांकुशा एकादशी कब शुरू होगी?

पापांकुशा एकादशी 2025 में एकादशी तिथि का प्रारंभ 2 अक्टूबर 2025, गुरुवार को शाम 7:13 बजे से होगा और यह तिथि 3 अक्टूबर 2025, शुक्रवार को शाम 6:34 बजे तक रहेगी। व्रत उपवास की तिथि 3 अक्टूबर 2025 (शुक्रवार) को रहेगी, जबकि पारण का समय 4 अक्टूबर 2025, शनिवार को सूर्योदय के बाद निर्धारित है। 

  

7. पापांकुशा एकादशी पर क्या नहीं करना चाहिए?

· तामसिक और नशीले पदार्थों का सेवन न करें 

· झूठ, क्रोध, छल-कपट से बचें 

· अन्न-जल से परहेज करें (यदि पूर्ण व्रत कर रहे हों) 

· दूसरों का अपमान न करें 

8. पापांकुशा एकादशी के दिन क्या करें?

· उपवास रखें  

· भगवद्गीता का पाठ करें 

· दान-दक्षिणा करें 

· व्रत कथा सुनें 

· ब्राह्मण भोजन कराएं 

9. इसे पापांकुशा एकादशी क्यों कहते हैं?

"पाप" यानी पाप और "अंकुश" यानी नियंत्रण । इस दिन व्रत रखने से व्यक्ति के समस्त पापों पर अंकुश लगता है और वह पवित्रता की ओर अग्रसर होता है, इसलिए इसे पापांकुशा एकादशी कहा जाता है। 

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