महालय अमावस्या 2025
महालय अमावस्या सनातन धर्म में बहुत महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। यह पितृ पक्ष (16 दिन का चंद्र काल) का अंतिम दिन होता है। पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। महालय अमावस्या के दिन लोग अपने पूर्वजों को धन्यवाद देते हैं, उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और उनके योगदान को याद कर श्रद्धांजलि देते हैं। यह माना जाता है कि इस दिन किए गए तर्पण और श्राद्ध से पितरों की आत्मा को तृप्ति मिलती है और वे शांति से आगे बढ़ पाते हैं। यह दिन जीवन और मृत्यु के चक्र की याद दिलाता है और हमें हमारे पूर्वजों, परंपराओं और मूल्यों से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है। साथ ही यह आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना करने का अवसर भी है।
महालय अमावस्या क्या है?
महालय अमावस्या को सनातन धर्म में 'सर्व पितृ अमावस्या' या 'पितृ अमावस्या' के नाम से भी जाना जाता है । यह आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि होती है, जो पितृपक्ष के समापन का प्रतीक है । यह दिन पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष दिलाने के लिए अंतिम दिन होता है, जिसके बाद वे पितृ लोक वापस चले जाते हैं । इस दिन का दोहरा महत्व है। एक ओर, यह पितृपक्ष का अंतिम दिन है, जब पितर अपने लोक लौट जाते हैं। इस दिन श्राद्ध और तर्पण पाकर वे अपने वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं । दूसरी ओर, यह आदिशक्ति मां दुर्गा के कैलाश पर्वत से धरती पर आगमन का दिन भी है, जिससे शारदीय नवरात्रि और दुर्गा पूजा उत्सव का आरंभ होता है। इसी दिन देवी भागवती का आह्वान किया जाता है । संस्कृत में 'महालय' शब्द 'महा' (उत्सव/महान) और 'आलय' (शुरुआत/निवास) से मिलकर बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ 'उत्सवों की शुरुआत' या 'महान निवास' है । यह नाम इस दिन के दोहरे महत्व को दर्शाता है – पितरों की विदाई और उत्सवों का आगमन।
महालय अमावस्या 2025: तिथि और शुभ मुहूर्त
वर्ष 2025 में महालय अमावस्या रविवार, 21 सितंबर 2025 को मनाई जाएगी । यह तिथि पितृपक्ष का समापन और देवीपक्ष का आरंभ करेगी।
अमावस्या तिथि का आरंभ और समापन:
- अमावस्या तिथि आरंभ: 21 सितंबर 2025 को रात्रि 12:16 बजे
- अमावस्या तिथि समाप्त: 22 सितंबर 2025 को रात्रि 01:23 बजे
श्राद्ध और तर्पण के लिए विशेष मुहूर्त:
पितरों के श्राद्ध और तर्पण जैसे अनुष्ठानों के लिए कुछ विशेष मुहूर्त अत्यंत शुभ माने जाते हैं। इन मुहूर्तों में किए गए कर्मों का फल अधिक प्राप्त होता है । इन विशिष्ट मुहूर्तों का उल्लेख केवल जानकारी प्रदान करने तक सीमित नहीं है, बल्कि अनुष्ठानों की प्रभावशीलता के लिए
इनका विशेष महत्व है।
- कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:50 बजे से दोपहर 12:38 बजे तक
- रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:38 बजे से दोपहर 01:27 बजे तक
- अपराह्न काल: दोपहर 01:27 बजे से दोपहर 03:53 बजे तक
सनातन धर्म में किसी भी पर्व या तिथि का निर्धारण सूर्योदय के समय उस तिथि की उपस्थिति के आधार पर किया जाता है, जिसे उदयातिथि कहा जाता है। चूंकि 21 सितंबर को सूर्योदय के समय अमावस्या तिथि मौजूद रहेगी, इसलिए महालय अमावस्या इसी दिन मनाई जाएगी।
महालय अमावस्या की पौराणिक कथा
महालय अमावस्या का संबंध दो प्रमुख पौराणिक आख्यानों से है, जो इसके दोहरे महत्व को दर्शाते हैं:
महिषासुर मर्दिनी मां दुर्गा का प्राकट्य:
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महालय अमावस्या का संबंध मां दुर्गा के पृथ्वी पर आगमन से है। एक समय था जब राक्षस महिषासुर ने अपनी क्रूरता से तीनों लोकों में आतंक मचा रखा था। उसे भगवान ब्रह्मा से यह वरदान प्राप्त था कि कोई देवता या मनुष्य उसका वध नहीं कर पाएगा । इस वरदान के मद में चूर होकर उसने देवताओं पर आक्रमण कर दिया और स्वर्गलोक पर भी कब्ज़ा कर लिया। देवताओं की प्रार्थना पर, ब्रह्मा, विष्णु और महेश सहित सभी प्रमुख देवताओं ने अपनी सामूहिक शक्तियों को मिलाकर आदिशक्ति मां दुर्गा का सृजन किया ।
देवी दुर्गा और महिषासुर के बीच नौ दिनों तक भयंकर युद्ध चला । यह युद्ध इतना भीषण था कि इससे पृथ्वी कांप उठी थी। दसवें दिन, मां दुर्गा ने अपने दिव्य अस्त्रों और अदम्य शक्ति से महिषासुर का वध कर दिया, जिससे देवताओं और पृथ्वी पर शांति बहाल हुई । महालय को इस युद्ध से पहले मां दुर्गा के पृथ्वी पर आने के दिन के तौर पर मनाया जाता है । यह दुर्गा पूजा उत्सव शुरू होने से ठीक एक दिन पहले का दिन होता है, जब मां की मूर्ति को अंतिम रूप दिया जाता है और उनकी आंखें तैयार की जाती हैं ।
पितरों की मुक्ति और तर्पण का महत्व:
महालय अमावस्या का एक और महत्वपूर्ण पहलू पितरों से जुड़ा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, असुरों और देवताओं के बीच हुए भयंकर युद्धों में बड़ी संख्या में देवों और ऋषियों की मृत्यु हो गई थी । इन दिवंगत आत्माओं को तर्पण प्रदान करने के लिए महालय का दिन निर्धारित किया गया। इस दिन का विशेष महत्व उन लोगों के लिए भी है जिन्हें अपने पूर्वजों की श्राद्ध तिथि ज्ञात नहीं होती है । ऐसे में, महालय अमावस्या पर तर्पण करने से उन सभी पितरों को मोक्ष और शांति प्राप्त होती है, जिससे परिवार को उनका आशीर्वाद मिलता है और पितृ दोष से मुक्ति मिलती है । यह दिन पितरों को संतुष्ट करके उन्हें पितृ लोक वापस भेजने का अंतिम अवसर माना जाता है ।
महालय अमावस्या के अनुष्ठान
महालय अमावस्या पर मुख्य रूप से दो प्रकार के अनुष्ठान किए जाते हैं: पितरों के लिए श्राद्ध और तर्पण, तथा मां दुर्गा के आगमन का आह्वान।
- पितरों के लिए श्राद्ध और तर्पण: यह महालय अमावस्या का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। इस दिन उन सभी पितरों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु अमावस्या, पूर्णिमा या चतुर्दशी तिथि को हुई हो, या जिनकी मृत्यु तिथि याद न हो । इस दिन सुबह जल्दी उठकर पवित्र नदी, जलाशय या कुंड में स्नान करना चाहिए। यदि यह संभव न हो, तो घर पर ही नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें । स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों को जल अर्पित किया जाता है । तर्पण के लिए एक पात्र में जल लेकर उसमें कुश, तिल और अनाज मिलाया जाता है । इसके बाद पितरों का आह्वान करते हुए जल अर्पित किया जाता है। पिंड दान भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें जौ के आटे, तिल और चावल से बने पिंड पितरों को अर्पित किए जाते हैं ।
- ब्राह्मण भोजन और दान: श्राद्ध कर्म के बाद, पितरों के निमित्त सात्विक भोजन तैयार किया जाता है, जिसमें पूरी, खीर, सब्जी और चावल शामिल होते हैं । इस भोजन का कुछ अंश पितरों के नाम से निकालकर दक्षिण दिशा में रखा जाता है । इसके बाद, किसी योग्य ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है और इच्छानुसार दान-दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है । दान में गाय का दूध और घी, कच्चा या पका अनाज, वस्त्र आदि देना शुभ माना जाता है ।
- पशु-पक्षियों को भोजन: इस दिन गाय, कुत्ता, चींटी और कौए को भोजन कराना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि इन्हें पितरों का अंश माना जाता है । ऐसा करने से पितर प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद देते हैं ।
- संध्याकालीन अनुष्ठान: शाम के समय, घर के दरवाजे पर सरसों के तेल का दीपक जलाकर पूड़ी और मिठाई रखना चाहिए । यह मान्यता है कि दीपक की रोशनी पितरों को उनके लोक वापस जाने का रास्ता दिखाती है, और वे संतुष्ट होकर घर से विदा लेते हैं । घर के ईशान कोण में गाय के घी का दीपक जलाना भी सुख-समृद्धि लाता है ।
- मां दुर्गा का आह्वान: पितृपक्ष के समापन के साथ ही, महालय अमावस्या मां दुर्गा के आगमन का दिन भी है। इस दिन बंगाल में विशेष रूप से 'महिषासुर मर्दिनी' का पाठ सुना जाता है, जो मां दुर्गा की महिमा और महिषासुर पर उनकी विजय की कथा का वर्णन करता है । यह देवी पक्ष की शुरुआत का प्रतीक है और दुर्गा पूजा के लिए उत्साह का संचार करता है ।
महालय अमावस्या के लाभ
महालय अमावस्या पर किए गए अनुष्ठानों से अनेक लाभ प्राप्त होते हैं, जो भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार के होते हैं:
· पितृ दोष से मुक्ति: यह पितृ दोष से मुक्ति पाने का एक महत्वपूर्ण अवसर है । जिन लोगों पर पितृ दोष होता है, वे जीवन में कई समस्याओं का सामना करते हैं। इस दिन श्राद्ध और तर्पण करने से पितृ दोष का निवारण होता है और पितरों की आत्मा को शांति मिलती है ।
· पितरों का आशीर्वाद: श्राद्ध, तर्पण और दान-पुण्य से पितर तृप्त होते हैं और अपने वंशजों को सुख-समृद्धि, सुरक्षा और मोक्ष का आशीर्वाद देते हैं । यह आशीर्वाद जीवन में शांति, खुशी और उन्नति लाता है ।
· अज्ञात पितरों को मोक्ष: यदि किसी व्यक्ति को अपने पूर्वजों की श्राद्ध तिथि याद न हो या वे पूरे पितृपक्ष में तर्पण न कर पाए हों, तो महालय अमावस्या पर श्राद्ध करने से सभी भूले-भटके पितरों को मोक्ष प्राप्त होता है ।
· उत्सवों का आरंभ: यह दिन शारदीय नवरात्रि और दुर्गा पूजा जैसे बड़े उत्सवों की शुरुआत का प्रतीक है । पितरों को संतुष्ट करने के बाद देवी की पूजा का आरंभ करना एक शुभ और पूर्णता का अनुभव प्रदान करता है।
· पुण्य की प्राप्ति: इस दिन दान-पुण्य करना अत्यधिक फलदायी माना जाता है। गरीबों, ब्राह्मणों और पशु-पक्षियों को भोजन कराने से पुण्य कर्मों में वृद्धि होती है ।
· पारिवारिक सुख और शांति: पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होने से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है ।
महालय अमावस्या पूजा विधि
महालय अमावस्या पर पूजा विधि को तीन चरणों में बांटा जा सकता है: सुबह, दोपहर और शाम।
· सुबह की पूजा:
1. स्नान और शुद्धि: सुबह उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें । यदि संभव हो तो पवित्र नदी में स्नान करें या घर पर नहाने के पानी में गंगाजल मिलाएं । पूजा स्थान को गंगाजल और पंचामृत से शुद्ध करें ।
2. सूर्यदेव को अर्घ्य: स्नान के बाद सूर्यदेव को अर्घ्य दें ।
3. पितरों का आह्वान: पूजा स्थान पर पितरों की तस्वीर स्थापित करें । दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें और पितरों को याद करते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें।
4. तर्पण: एक पात्र में जल, कुश, तिल और अनाज (जौ, काले तिल) मिलाएं । पितरों का आह्वान करते हुए जल अर्पित करें । जल को अंगूठे और तर्जनी के बीच से प्रवाहित करें ।
· दोपहर की पूजा (श्राद्ध कर्म):
1. भोजन तैयार करना: दोपहर में पितरों के लिए सात्विक भोजन तैयार करें। तामसिक चीजों का प्रयोग बिल्कुल न करें । पूरी, खीर, सब्जी, चावल आदि मुख्य व्यंजन होते हैं ।
2. पिंडदान: जौ के आटे, तिल और चावल से बने पिंड अर्पित करें । हाथ में कुश, जौ, काला तिल, अक्षत और जल लेकर संकल्प करें ।
3. पितरों को भोजन अर्पित करना: तैयार भोजन का कुछ अंश पितरों के नाम से निकालकर दक्षिण दिशा में रखें ।
4. ब्राह्मण भोजन: किसी योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराएं। उन्हें दान-दक्षिणा दें और उनका आशीर्वाद लें ।
5. पशु-पक्षियों को भोजन: गाय, कुत्ता, चींटी और कौए को भोजन अवश्य कराएं । हरे चारे का दान भी करें ।
· शाम की पूजा:
1. दीप प्रज्वलन: शाम के समय घर के दरवाजे पर सरसों के तेल का दीपक जलाएं और उसके पास पूड़ी व मिठाई रखें ।
2. ईशान कोण में दीपक: घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में पूजा वाले स्थान पर गाय के घी का दीपक जलाएं ।
3. जागरण और कथा: रात में जागरण करें और पितरों की कथा या गीता/गरुड़ पुराण का पाठ करें ।
महालय अमावस्या मंत्र जप
महालय अमावस्या पर पितरों की शांति और आशीर्वाद के लिए कुछ विशेष मंत्रों का जप किया जाता है:
· संकल्प मंत्र: ॐ अद्य श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त... तर्पणम् च अहं करिष्ये।।
· पितृ गायत्री मंत्र: ॐ पितृ गणाय विद्महे। जगत धारिणे धीमहि। तन्नो पितरो प्रचोदयात्।।
· स्वधा देवी मंत्र: ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा
· गायत्री मंत्र: ॐ भूर भुवः स्वाहा... धियो यो नः प्रचोदयात्।।
महालय अमावस्या का महत्व
- पितृ ऋण से मुक्ति: यह दिन पितृ ऋण चुकाने और पूर्वजों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने का अंतिम अवसर होता है । पितरों का श्राद्ध और तर्पण करके व्यक्ति अपने वंश को आगे बढ़ाने और पूर्वजों के योगदान को स्वीकार करने की परंपरा को निभाता है।
- आध्यात्मिक शुद्धि: पितरों को संतुष्ट करने से व्यक्ति के जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है । यह दिन आत्म-शुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा के संचार के लिए महत्वपूर्ण है।
- देवी आगमन का स्वागत: महालय अमावस्या देवी दुर्गा के पृथ्वी पर आगमन का दिन है । यह दुर्गा पूजा उत्सव की शुरुआत का प्रतीक है, जो शक्ति की उपासना और बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व है। पितरों को विदा करके देवी का स्वागत करना एक पूर्ण और शुभ संक्रमण का अनुभव कराता है।
- पीढ़ियों का संबंध: यह दिन पिछली पीढ़ियों के प्रति आभार व्यक्त करने का एक ज़रिया है, जिन्होंने हमारे जीवन में किसी न किसी रूप में अपना योगदान दिया है । हम जो भाषा बोलते हैं, जिस तरह बैठते हैं, हमारे कपड़े, हमारी इमारतें – आज हम जो कुछ भी जानते हैं,
लगभग हर चीज हमें पिछली पीढ़ियों से मिली है । - मोक्ष का मार्ग: इस दिन श्राद्ध और तर्पण करने से पितरों को मोक्ष प्राप्त होता है, खासकर उन लोगों को जिनकी मृत्यु तिथि अज्ञात हो या जिनका श्राद्ध पहले न हो पाया हो ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. महालय अमावस्या क्यों मनाते हैं?
महालय अमावस्या दो मुख्य कारणों से मनाई जाती है: पहला, यह पितृपक्ष का अंतिम दिन होता है जब पितरों को श्राद्ध और तर्पण के माध्यम से विदा किया जाता है ताकि उन्हें मोक्ष मिल सके और वे अपने वंशजों को आशीर्वाद दे सकें । दूसरा, यह आदिशक्ति मां दुर्गा के पृथ्वी पर आगमन का दिन है, जो शारदीय नवरात्रि और दुर्गा पूजा उत्सव की शुरुआत का प्रतीक है ।
2. महालय अमावस्या पर क्या करें और क्या न करें?
क्या करें:
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, यदि संभव हो तो पवित्र नदी में या घर पर गंगाजल मिलाकर ।
- दक्षिण दिशा में पितरों को जल अर्पित करें और उनका तर्पण करें ।
- पितरों के निमित्त सात्विक भोजन तैयार करें ।
- किसी योग्य ब्राह्मण को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा दें ।
- गाय, कुत्ता, चींटी और कौए को भोजन कराएं ।
- शाम को घर के दरवाजे पर सरसों के तेल का दीपक जलाएं और पूड़ी-मिठाई रखें ।
- पितृ गायत्री मंत्र और स्वधा देवी के मंत्रों का जप करें ।
- गीता या गरुड़ पुराण के कुछ अध्यायों का पाठ करें ।
- घर में साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें ।
क्या न करें:
- तामसिक भोजन का सेवन न करें ।
- किसी से लड़ाई-झगड़ा न करें या अपशब्द न बोलें ।
- कुत्ता, गाय और कौवे जैसे जीवों को कष्ट न दें ।
- झूठ बोलने से बचें और मन को शांत रखें ।
- ब्रह्मचर्य का पालन करें ।
- इस दिन किसी और के घर भोजन न करें ।
- पितरों को बुरा-भला न कहें ।
3. घर पर महालय अमावस्या पूजा कैसे करें?
घर पर महालय अमावस्या की पूजा करने के लिए, सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें। दक्षिण दिशा में मुख करके पितरों को जल अर्पित करें। घर पर सात्विक भोजन (पूरी, खीर, सब्जी, चावल) बनाकर पितरों के नाम का भोजन निकालकर दक्षिण दिशा में रख दें । इसके बाद ब्राह्मण, गरीब, गाय, कुत्ता और कौए को भोजन खिलाएं । शाम को दक्षिण दिशा में दीपक जलाएं । मंत्र जप और पितरों की कथा का पाठ करें।
4. महालय अमावस्या पर किस देवता की पूजा करें?
महालय अमावस्या पर मुख्य रूप से पितरों की पूजा (श्राद्ध, तर्पण) की जाती है, ताकि उन्हें मोक्ष और शांति मिल सके । इसके साथ ही, यह दिन आदिशक्ति मां दुर्गा के पृथ्वी पर आगमन का भी प्रतीक है, इसलिए मां दुर्गा का आह्वान भी किया जाता है । ब्रह्मपुराण के अनुसार, देवताओं की पूजा से पहले पूर्वजों की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि इससे देवता प्रसन्न होते हैं ।
5. महालय अमावस्या भारत के विभिन्न राज्यों में कैसे मनाई जाती है?
महालय अमावस्या पूरे भारत में 'सर्व पितृ अमावस्या' के रूप में मनाई जाती है, जहां पितरों के श्राद्ध और तर्पण पर विशेष जोर दिया जाता है । हालांकि, पश्चिम बंगाल में इसका विशेष महत्व है, जहां यह दुर्गा पूजा उत्सव के आरंभ का प्रतीक है । इस दिन बंगाली समुदाय में 'महिषासुर मर्दिनी' का पाठ सुना जाता है और मां दुर्गा की मूर्ति को अंतिम रूप दिया जाता है । झारखंड के रांची जैसे शहरों में भी बंगाली समुदाय महालय को लेकर काफी उत्साहित रहता है और विशेष कार्यक्रमों का आयोजन करता है ।
6. महालय अमावस्या पर क्या पहनना चाहिए?
महालय अमावस्या पर स्वच्छ और पवित्र वस्त्र पहनने चाहिए । आमतौर पर, हल्के रंग के, विशेषकर सफेद या पीले रंग के वस्त्र शुभ माने जाते हैं, जो शांति और पवित्रता का प्रतीक हैं। गहरे या चमकीले रंगों से बचना चाहिए।
7. महालय अमावस्या पर क्या खाना चाहिए?
महालय अमावस्या पर सात्विक भोजन करना चाहिए। इसमें पूरी, खीर, सब्जी, और चावल जैसे व्यंजन शामिल होते हैं । तामसिक भोजन का सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए । चना, हरी सरसों के पत्ते, मूली, लौकी, खीरा, जौ, मसूर की दाल और काला नमक का सेवन भी वर्जित माना जाता है । इस दिन किसी और के घर भोजन करने से भी बचना चाहिए ।
8. महालय अमावस्या के दिन क्या पहनना चाहिए?
महालय अमावस्या के दिन पवित्रता और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए हल्के रंग के कपड़े जैसे सफेद, क्रीम या हल्का पीला पहनना शुभ माना जाता है। सफेद वस्त्र शांति और पवित्रता का प्रतीक होते हैं। पुरुष पारंपरिक धोती-कुर्ता या साधारण कुर्ता-पायजामा और महिलाएँ हल्के रंग की साड़ी या सूती सलवार-कुर्ता पहनकर इस दिन की गरिमा बनाए रख सकती हैं। पवित्रता और सादगी से पूर्वजों के प्रति सम्मान और श्रद्धा व्यक्त होती है। सादा पहनावा मन को शुद्ध और शांत रखने में मदद करता है।
महालय अमावस्या पर स्वधा देवी, जो पितरों की अधिष्ठात्री देवी हैं, का विशेष पूजन किया जाता है। श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान में 'स्वधा' मंत्र का उच्चारण पितरों तक अर्पित सामग्री पहुंचाने का माध्यम माना जाता है। इस दिन ईशा फाउंडेशन द्वारा "कालभैरव शांति" और "अग्नि अर्पणम्" जैसे विशेष अनुष्ठान पूर्वजों की शांति के लिए किए जाते हैं। महालय अमावस्या, पितृपक्ष की पूर्णता और देवीपक्ष के शुभारंभ का संकेत देती है, जो हमें पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और देवी दुर्गा के स्वागत का अवसर प्रदान करती है।







