कार्तिक पूर्णिमा 2025
कार्तिक मास भगवान विष्णु जी को पूर्णरूप से समर्पित है। कार्तिक मास भगवान विष्णु को सदा ही प्रिय है इसदिन दान, स्नान करने से सैकड़ों वर्षों के पाप नष्ट हो जाते है। कार्तिक मास सभी मासों में उत्तम है और उनमे से भी कार्तिक पूर्णिमा का महत्व विशेष है। इस दिन पूजा करने के बाद दीपदान करने का विशेष महत्व है इसलिए इसे देव दिवाली भी कहते है। कार्तिक पूर्णिमा को लेकर कई कथाएं प्रचलित है कई प्रकार के मतभेद भी है, अनेक स्थानों पर इनकी पूजा विधि भी अलग-अलग ही है और यह उचित भी है कि हमे अपनी पारंपरिक विधि के अनुसार ही पूजा करनी चाहिए।
इसके अलावा कार्तिक मास को बहुत ही पवित्र इसलिए भी माना जाता है क्योंकि इसी दिन भगवान विष्णु अपनी चार माह की योग निंद्रा के पश्चात उठते हैं साथ ही इसी मास में माता तुलसी का विवाह भी होता है इसलिए कार्तिक पूर्णिमा के दिन किसी पवित्र नदी में स्नान करना अति उत्तम माना जाता है। पुराणों के अनुसार कार्तिक मास की पूर्णिमा पर भगवान कार्तिकेय जी का दर्शन और उनका पूजन करना अत्यंत शुभ माना गया है। जो जातक इस शुभ दिन पर भगवान कार्तिकेय जी का विधिपूर्वक पूजन करते हैं उन्हे सम्पूर्ण शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।
कार्तिक पूर्णिमा क्या है?
कार्तिक पूर्णिमा सनातन धर्म का एक अत्यंत पावन और पुण्यदायक पर्व है, जिसे कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस दिन देव दीपावली, भगवान शिव की त्रिपुरासुर पर विजय, भगवान विष्णु के योगनिद्रा से जागरण, तुलसी विवाह, और भगवान कार्तिकेय की पूजा जैसे धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं।
इस तिथि का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह चातुर्मास का अंतिम दिन होता है, जिसके बाद सभी मांगलिक कार्य जैसे विवाह, यज्ञ, गृह प्रवेश आदि पुनः आरंभ होते हैं।
पुराणों के अनुसार, इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, दीपदान, व्रत, और दान करने से हजारों यज्ञों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। विशेष रूप से भगवान कार्तिकेय का पूजन इस दिन अत्यंत शुभ और शत्रु नाशक माना गया है।
कार्तिक पूर्णिमा तिथि, समय 2025
इस वर्ष 5 नवंबर 2025 को कार्तिक पूर्णिमा मनायी जाएगी। कार्तिक पूर्णिमा की तिथि 4 नवंबर 2025 को 10:38 P.M से प्रारंभ होगी और 5 नवंबर 2025 को 6:50 P.M पर समाप्त होगी ।
कार्तिक पूर्णिमा की कथा
माँ तुलसी और भगवान विष्णु का विवाह
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर पूर्णिमा तक, तुलसी विवाह का पर्व मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, तुलसी (वृंदा), असुरराज शंखचूड़ की धर्मपत्नी थीं और एक महान पतिव्रता थीं। शंखचूड़ को ब्रह्मा जी से अजेय होने का वरदान प्राप्त था — परंतु शर्त यह थी कि जब तक उसकी पत्नी का सतीत्व भंग न हो और वह भगवान विष्णु के कवच को धारण करे, तब तक उसकी मृत्यु नहीं हो सकती थी। वैसे तो शंखचूड धार्मिक था पर उसने देवताओ से उनका राज्य छीन लिया था।
देवताओं के आग्रह पर भगवान विष्णु ने एक वृद्ध ब्राह्मण और फिर स्वयं शंखचूड़ का रूप धारण करके तुलसी का सतीत्व भंग किया, और भगवान शिव ने शंखचूड़ का वध कर दिया। जब तुलसी को इस बात का ज्ञान हुआ कि उनके साथ छल हुआ है, तो उन्होंने भगवान विष्णु को शिला (पत्थर) बन जाने का श्राप दे दिया। इसी के प्रभाव से विष्णु जी शालिग्राम रूप में गंडकी नदी में स्थित हुए, और तुलसी माता वृक्ष रूप में परिवर्तित हो गईं।
तब भगवान विष्णु ने तुलसी जी को वरदान दिया कि वे सदा उनके साथ पूजी जाएंगी, और कार्तिक पूर्णिमा को उनका शालिग्राम रूप में विवाह तुलसी जी के साथ संपन्न किया जाएगा। इसीलिए इस दिन को तुलसी विवाह और विष्णु पूजन के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
भगवान शिव और त्रिपुरासुर वध
इसी कार्तिक पूर्णिमा को भगवान शिव ने तीन असुर भाइयों -त्रिपुरासुर -का वध किया था, जिन्होंने तीनों लोकों में आतंक फैला रखा था। ब्रह्मा जी से प्राप्त वरदानों से वे अमर जैसे हो गए थे। जब उनका अत्याचार असहनीय हो गया, तब देवताओं ने शिव जी से प्रार्थना की।
भगवान शिव ने एक दिव्य रथ पर सवार होकर अपने पिनाक धनुष से एक ही बाण में तीनों त्रिपुरों का संहार किया। इसी उपलक्ष्य में देवताओं ने दीप जलाकर विजय उत्सव मनाया, जिसे आज भी लोग देव दीपावली के रूप में कार्तिक पूर्णिमा को मनाते है।
कार्तिक पूर्णिमा की पूजा विधि
केले के पत्तो का मंडप सजाने की विधि:
पूर्णिमा को प्रातःकाल उठकर समस्त नित्यकर्मों की समाप्ति करके भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए। बगीचे में या घर पर भगवान विष्णु जी के भक्त को कार्तिक पूर्णिमा के दिन मण्डप बनाना चाहिए। मण्डप को केले के खंभों से, आम के पत्तों को लगाकर ऊख के डंडे खड़े करके सजाना चाहिए। विचित्र वस्त्रोंसे मण्डप को अलंकृत करके उसमें भगवान विष्णु जी की पूजा करनी चाहिए। इसके बाद भक्त को पवित्र, शांत, ईर्ष्यारहित मन से वहीं बैठकर सत्यनारायण की कथा कहनी चाहिए।
क्षीरसागर दान विधि:
इस दिन चंद्रमा उदय होने पर विष्णुजी, कार्तिकेय जी , अग्निदेव और वरुण देव जी की गंध, पुष्प, धूप, दीप, प्रचुर नैवेद्य, उत्तम अन्न, फल तथा शाक के द्वारा पूजा करनी चाहिए। इस प्रकार पूजा करने के बाद बाहर दीपदान करना चाहिए। दीपकों के पास ही एक चौकोर गड्ढा खोदे, उसकी लंबाई, चौड़ाई और गहराई चौदह अंगुल होनी चाहिए। फिर गाय के दूध से गड्ढे को भर दे। तत्पश्चात उसमें स्वर्ण की एक मछली डाले। फिर ‘महमत्स्याय नमः’ इस मंत्र का उच्चारण करते हुए उसकी पूजा करे और उस स्वर्ण की मत्स्य को आचार्य को दान कर दे। यह क्षीरसागर के दान करने की विधि है ।
कार्तिक पूर्णिमा के लाभ
कार्तिक पूर्णिमा व्रत और पूजन के प्रमुख लाभ:
1. पवित्र नदियों में स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं और आत्मा शुद्ध होती है।
2. इस दिन भगवान विष्णु, लक्ष्मी और शिव जी की पूजा करने से सुख, समृद्धि और आरोग्यता की प्राप्ति होती है।
3. दीपदान और व्रत करने से गृहदोष, पितृदोष और आर्थिक बाधाएं दूर होती हैं।
4. जो जातक इस दिन भगवान कार्तिकेय का पूजन करता है, उसे शत्रु नाश, तेज और पराक्रम की प्राप्ति होती है।
5. कार्तिक पूर्णिमा को किए गए दान-पुण्य का फल कई गुना होकर लौटता है और जीवन में धर्म, मोक्ष और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
6. यह दिन तुलसी विवाह तथा देव दीपावली के रूप में मनाए जाने से मांगलिक कार्यों की शुरुआत के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
कार्तिक पूर्णिमा पर मंत्र जप
कार्तिक पूर्णिमा के दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु, माँ लक्ष्मी और भगवान शिव की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। इस दिन मंत्र जप का कोई खास विधान नहीं बताया गया है, यदि आप मंत्रों का जप करना चाहते है तो भगवान विष्णु , माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए पूजन के दौरान मंत्र जप कर सकते है।
इस पावन अवसर पर निम्न मंत्रों का जप अत्यंत फलदायी माना गया है:
• भगवान विष्णु के लिए:
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"
• माँ लक्ष्मी के लिए:
"ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः"
• भगवान शिव के लिए:
"ॐ नमः शिवाय"
कार्तिक पूर्णिमा का महत्त्व
जो जातक कार्तिक पूर्णिमा के शुभ दिन पर भगवान कार्तिकेय जी का विधिपूर्वक पूजन करते हैं उन्हे सम्पूर्ण शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। इस दिन क्षीर सागर दान और दीप दान का विशेष महत्त्व बताया गया है। क्षीरसागर दान और दीपदान के लिए चंद्रमा उदय के समय कार्तिकेय ,वरुण और अग्नि देव की धूप दीप आदि के द्वारा पूजन करके घर के बाहर दीप का दान करना चाहिए साथ ही दीपकों के पास ही एक चार अंगुल का चौकोर गड्ढा खोदकर उसे गाय के दूध से भरकर उसमें मोती से बने नेत्रों वाली मछली डालकर धूप दीप आदि से पूजा करके उसे दान देना चाहिए। इस प्रकार के क्षीरसागर दान के प्रभाव से मनुष्य भगवान विष्णु का प्रिय बन जाता है और उसे रुद्रलोक की प्राप्ति होती है साथ ही इस दिन भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी के साथ चंद्रदेव की पूजा करने से भक्तों की आर्थिक, मानसिक और शारीरिक समस्याएं दूर होती हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. हम कार्तिक पूर्णिमा क्यों मनाते हैं?
कार्तिक पूर्णिमा धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ तिथि है। इस दिन स्नान, दान और व्रत करने से पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह दिन भगवान शिव, विष्णु और तुलसी माता की कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ अवसर माना गया है।
2. घर पर कार्तिक पूर्णिमा की पूजा कैसे करें?
घर पर केले और आम के पत्तों से मंडप सजाकर भगवान विष्णु की पूजा करें। ऊख के डंडे लगाएं, दीप जलाएं, और शांत चित्त से सत्यनारायण कथा पढ़ें। चंद्र उदय पर क्षीरसागर दान विधि से पूजन कर, स्वर्ण मत्स्य सहित दूध दान करें। इससे पुण्य और समृद्धि प्राप्त होती है।
3. 2025 में कार्तिक पूर्णिमा कब शुरू होगी?
5 नवंबर 2025 को कार्तिक पूर्णिमा मनायी जाएगी। कार्तिक पूर्णिमा की तिथि 4 नवंबर 2025 को 10:38 P.M से प्रारंभ होगी और 5 नवंबर 2025 को 6:50 P.M पर समाप्त होगी ।
4. कार्तिक पूर्णिमा के दिन क्या करें और क्या न करे ?
• तामसिक पदार्थों का सेवन वर्जित है।
• किसी का अपमान न करें।
• मां लक्ष्मी स्वच्छ और सुव्यवस्थित स्थान पर ही वास करती हैं। इसलिए घर में गंदगी और अव्यवस्था न रखें।
• यदि कोई भिक्षुक, साधु या जरूरतमंद द्वार पर आए, तो उसे यथासंभव अन्न, वस्त्र या दक्षिणा अवश्य दें।
• घर के हर कोने में दीप जलाएं, अंधकार न रखें।
5. इसे कार्तिक पूर्णिमा क्यों कहा जाता है?
कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को कार्तिक पूर्णिमा कहा जाता है। इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया था, भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं, और माता तुलसी विवाह हेतु सुयोग्य मानी जाती हैं।







