कजरी तीज 2025
कजरी तीज भारतीय सनातन परंपरा में हर विवाहित महिला के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत है। इसे कजली तीज, बूढ़ी तीज, सातुड़ी तीज के नामों से भी जाना जाता है। यह व्रत भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को विवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। इस व्रत को करने का
मुख्य उद्देश्य पति की दीर्घायु और वैवाहिक सुख की प्राप्ति करना है। अपनी परंपरा के अनुसार इस दिन महिलायें पारिवारिक प्रसंगों में गाना गाती है, नाचती है, झूला झूलती है और कजरी गीतों के माध्यम से अपने भाव को व्यक्त करती है। इसे विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश जैसे क्षेत्रों में बहुत ही खुशी से मनाया जाता है।
Kajari Teej 2025 तिथि और शुभ मुहूर्त: इस वर्ष 2025 में कजरी तीज 12 अगस्त को मनायी जाएगी।
- तृतीया तिथि प्रारंभ: 11 अगस्त को सुबह लगभग 10:36 से,
- तृतीया तिथि समाप्त: 12 अगस्त की सुबह लगभग 8:42 तक
स्थानीय समयानुसार ये समय बदल सकता है, पर अधिकांश पञ्चांग के अनुसार यही समय निश्चित है।
कजरी तीज की पौराणिक कथा
कजरी तीज एक ऐसा पर्व है जो केवल व्रत और पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देवी पार्वती की अद्भुत तपस्या, प्रेम और समर्पण की दिव्य गाथा को भी सजीव करता है। जिस प्रकार सावित्री ने अपने पति सत्यवान को यमराज से वापस पाया, उसी तरह कजरी तीज देवी पार्वती के उस दृढ़ निश्चय की याद दिलाती है, जब उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए वर्षों तक कठोर तप किया था।
इस व्रत की कथा यह संकेत देती है कि एक स्त्री की श्रद्धा, त्याग और निष्ठा से जीवन में शुभता और सौभाग्य आता है। महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं और विशेष रूप से चंद्रमा एवं भगवान शिव-पार्वती की पूजा करती हैं, ताकि उनके पति दीर्घायु हों और वैवाहिक जीवन सुखमय बना रहे। यह पर्व स्त्री की पतिव्रता शक्ति, भावनात्मक गहराई, और आध्यात्मिक समर्पण का प्रतीक है।
कजरी तीज का सांस्कृतिक पक्ष उतना ही मनमोहक है जितना उसका आध्यात्मिक पहलू। इस दिन स्त्रियाँ पारंपरिक कजरी गीत गाती हैं, जो वर्षा ऋतु की सजीवता, भावनात्मक प्रतीक्षा और प्रेम की मधुर कल्पनाओं से भरे होते हैं।
पूजा विधि –व्रत का अनुष्ठान
व्रत प्रारंभ
- महिलाएँ 11 अगस्त की रात से तैयारियाँ आरंभ करती हैं।
- सुबह, जौ, चना, गेहूं, चावल मिलाकर सत्तू तैयार किए जाते हैं। इसे व्रत खोलने के बाद ग्रहण किया जाता है।
पूजा सामग्री
- मिट्टी और गोबर से एक छोटी तालाब जैसी संरचना दीवार के सहारे बनाई जाती है और किनारों पर घी-गुड़ से सजावट की जाती है, तथा उसके पास नीम की टहनी लगायी जाती है।
- इसमें कच्चा दूध, जल, दिया, रोली, अक्षत, मौली, मेहंदी, काजल, सुगंध आदि अर्पित किए जाते हैं।
पूजा विधि :
1. नीमड़ी माता की आराधना: रोली‑चावल अर्पित करें, और दीवार पर हाथों से बिंदी के निशान लगाएं:
o मेहंदी‑रोली की बिंदी अनामिका अंगुलि से
o काजल की बिंदी तर्जनी अंगुलि से लगाई जाती है
2. वस्त्र, फल‑फूल अर्पित किए जाते है।
3. रोली टीका और लच्छा बाँधा जाता है।
4. शाम को झूला झूलते हुए कजरी गीत गाए जाते है।
5. चंद्रमा के दर्शन होने पर व्रत खोला जाता है।
व्रत खोलने की विधि
· यदि व्रत निर्जला (बिना जल और भोजन के) रखा गया हो, तो चंद्र दर्शन के बाद व्रत खोला जाता है।
· गर्भवती महिलाएं या स्वास्थ्य कारणों से व्रत रखने में असमर्थ महिलाएं फलाहार कर सकती हैं।
व्रत के नियम और सावधानियाँ
क्या करें :
· व्रत मन, वचन और कर्म से पूर्ण श्रद्धा के साथ करें।
· घर की दीवार पर गोबर से बनाए गए चबूतरे पर नीम की टहनी लगाएं और श्रद्धा से पूजन करें।
· दूध और दही का प्रयोग करें।
· व्रत के दिन स्वच्छ, हरे रंग के वस्त्र पहनें।
· विवाहित महिलाएं अपने विवाहिक परिधान पहनें।
· कजरी गीतों की मधुरता और सजे-धजे झूलों की लयबद्ध झूल के साथ उत्सव को जीवंत बनाएं।
· भक्तिपूर्ण मन और व्रत की भावना के साथ चंद्रमा को प्रणाम करें और उसका आशीर्वाद प्राप्त करें।
क्या न करें :
· राहुकाल में पूजा वर्जित है, इसलिए शुभ मुहूर्त ही चुनें।
· गीले कपड़े न पहनें।
· किसी से भी विवाद या क्रोध न करें।
· व्रत के दिन विचार, आहार और आचरण में पवित्रता और सादगी बनाए रखें।
· निर्जला व्रत पूर्ण अनुशासन के साथ करें—व्रत के दौरान न कुछ खाएं, न पिएं।
· अर्घ्य अर्पित किए बिना व्रत न करें।
· पूजा में पीतल, मिट्टी या तांबे के बर्तन प्रयोग करें।
कजरी तीज का महत्व
कजरी तीज का व्रत सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने की प्रबल इच्छाशक्ति और कठोर तप के साथ किया था। यही वजह है कि यह व्रत आज भी स्त्रियों के लिए आस्था और प्रेम का प्रतीक माना जाता है। जो कुंवारी कन्याएँ इस दिन सच्चे मन से व्रत रखती हैं, उन्हें योग्य और सद्गुणी जीवनसाथी का आशीर्वाद प्राप्त होता है। वहीं विवाहित महिलाएँ जब श्रद्धा से इस व्रत का पालन करती हैं, तो उनके पति की आयु लंबी होती है, वैवाहिक जीवन में आने वाले क्लेश दूर होते हैं और दांपत्य संबंधों में मिठास बनी रहती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन मां पार्वती और भगवान शिव की पूजा करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि आती है।जो महिलाएँ पूरे श्रद्धा-भाव से व्रत करती हैं, उन पर शिव-पार्वती की विशेष कृपा सदैव बनी रहती है, जिससे जीवन खुशहाल और सौभाग्यशाली बनता है।
मंत्र और आरती
व्रत के समय मंत्र और आरती के दौरान चारों ओर श्रद्धा और भक्ति का वातावरण रहता है, और ऐसे में नीमड़ी माता की पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है। पूजा विधि में भक्त रोली और काजल अर्पित करते हैं, अक्षत (अखंड चावल) से तिलक लगाते हैं और दूध व फलों का भेंट स्वरूप अर्पण करते हैं। यही सरल लेकिन प्रभावशाली मंत्र माता की कृपा को आकर्षित करते हैं। जब व्रत के दौरान भक्त भगवान शिव और माता पार्वती की आरती गाते हैं, तो यह न केवल वातावरण को शुद्ध करता है, बल्कि मन को भी आंतरिक शांति और गहन एकाग्रता प्रदान करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. कैसे कहा जा सकता है कि कजरी तीज, हरियाली तीज से अलग है?
दोनों तीज केवल महिलाओं द्वारा रखी जाती हैं और दोनों का आधार माता पार्वती और भगवान शिव के प्रति समर्पण है, तो फिर ये दोनों कैसे और किस संदर्भ में अलग हैं? इसका उत्तर इनके समय और भाव में छिपा है। हरियाली तीज श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में मनाई जाती है और यह
प्रेम की सुंदरता, प्रकृति के ताजे प्रेम, नए मौसम और वैवाहिक संबंध का प्रतीक है। जबकि कजरी तीज श्रावण मास के कृष्ण पक्ष में आती है, इसलिए इसका भाव अधिकतर विरह और प्रतीक्षा से जुड़ा होता है, हालांकि यह भक्ति का भी उत्सव है। यह चंद्रमा के सम्मान में भी मनाई जाती है और ग्रामीण परंपरा से जुड़ी होती है, जिसमें कजरी लोकगीत और झूले का आनंद लिया जाता है।
2. क्या अविवाहित कन्या भी व्रत रख सकती हैं?
हाँ, अविवाहित कन्याएं भी कजरी तीज का व्रत रख सकती हैं। इस विशेष अवसर पर भक्तजन व्रत रखते हैं और भगवान शिव व माता पार्वती को श्रद्धापूर्वक प्रणाम करते हैं।
3. गर्भवती स्त्रियाँ क्या व्रत रख सकती हैं?
गर्भवती महिलाएं अपनी सेहत का ध्यान रखते हुए यह व्रत कर सकती हैं। वे पूर्ण निर्जला व्रत रखने के बजाय फलों या हल्का भोजन और पानी लेकर भी श्रद्धा से व्रत का पालन कर सकती हैं।
4. कजरी गीत क्या हैं?
बारिश, विरह और प्रेम पर आधारित लोकगीत, जो विशेषकर झूला झूलते समय गाए जाते हैं।
5. कजरी तीज के अवसर पर किसकी पूजा होती है?
कजरी तीज के अवसर पर माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा की जाती है ताकि वैवाहिक जीवन सुखी और समृद्ध हो। महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए चंद्रमा को भी अर्घ्य देती हैं। कुछ क्षेत्रों में नीम की टहनी की भी पूजा की जाती है, यह मानते हुए कि वह ताबीज और औषधि की तरह काम करती है।







