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छठ पूजा 2025

छठ पूजा 2025

छठ पूजा सनातन धर्म का एक प्रमुख और अत्यंत पवित्र पर्व है, जिसे वर्ष में दो बार – चैत्र और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। इस पर्व में सूर्यदेव और छठी मैया की विशेष पूजा का विधान है। छठ पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है, लेकिन आज यह पूरे भारत और विदेशों में बसे भारतीयों द्वारा भी बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यह बिहार का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है।

छठ पूजा क्या है?

यह चार दिवसीय महापर्व चतुर्थी तिथि से आरंभ होकर सप्तमी तिथि को संपन्न होता है। हालांकि, तिथियों में उतार-चढ़ाव के कारण कभी-कभी यह षष्ठी तिथि को भी समाप्त हो जाता है। इस पर्व के दौरान श्रद्धालु कठोर नियमों का पालन करते हैं और संपूर्ण शुद्धता के साथ व्रत का पालन करते हैं। छठ पूजा की खास बात यह है कि इसमें उगते और अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा है। सूर्यदेव ऊर्जा और जीवन के स्रोत हैं, वहीं छठी मैया को संतान और परिवार की रक्षक माना जाता है। इनकी पूजा से जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली की प्राप्ति होती है।

छठ पूजा तिथि, समय 2025

शुभ मुहूर्त

चतुर्थी तिथि:

• प्रारंभ: 25 अक्टूबर 2025, सुबह 1:20 A.M बजे से

• समापन: 26 अक्टूबर 2025, सुबह 3:49 A.M बजे तक

(चतुर्थी तिथि 25 अक्टूबर 2025 को रात्रि 1:20 बजे से प्रारंभ हो रही है, इसलिए छठ पर्व का प्रारंभ 25 अक्टूबर 2025 से होगा। इस दिन चतुर्थी तिथि पूरे दिन रहेगी और 26 अक्टूबर 2025 को रात्रि के 3:49 बजे तक रहेगी। अतः 25 अक्टूबर 2025 को छठ पूजा का प्रथम दिन नहाय-खाए की शुरुआत सूर्योदय से प्रारंभ होगी)

• पंचमी तिथि:

• प्रारंभ: 26 अक्टूबर 2025 , सुबह 3:50 A.M बजे से

• समापन: 27 अक्टूबर , सुबह 6:06 A.M बजे तक

• षष्ठी तिथि:

• प्रारंभ: 27 अक्टूबर 2025, सुबह 6:06 A.M बजे से

• समापन: 28 अक्टूबर , सुबह 8:01 A.M बजे तक

• सप्तमी तिथि:

• प्रारंभ: 28 अक्टूबर 2025, सुबह 8:02 A.M बजे से

• समापन: 29 अक्टूबर 2025, सुबह 9:24 A.M बजे तक

अर्घ्य का समय:

• संध्या अर्घ्य (27 अक्टूबर 2025): सूर्यास्त का समय - सायं 5:30 P.M बजे

• प्रातः अर्घ्य (28 अक्टूबर 2025): सूर्योदय का समय - प्रातः 6:15 A.M बजे

छठ पूजा पूजा कहानी

बहुत समय पहले की बात है, एक प्रतापी राजा थे प्रियव्रत और उनकी प्रिय रानी थी मालिनी। वे दोनों बहुत सुखी थे, लेकिन उनके जीवन में एक गहरा दुख था – उन्हें कोई संतान नहीं थी। संतानहीनता के कारण राजा-रानी हमेशा उदास रहते थे। उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए कई देवी-देवताओं की पूजा की, बड़े-बड़े यज्ञ करवाए और हर संभव प्रयास किया, पर कोई फल नहीं मिला।

एक दिन, उनके महल में महर्षि कश्यप पधारे। राजा प्रियव्रत और रानी मालिनी ने बड़े आदर से उनका स्वागत किया और अपने दुख का कारण बताया। महर्षि कश्यप ने उनकी व्यथा सुनकर उन्हें एक पुत्रेष्टि यज्ञ करने की सलाह दी, जिससे उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हो सके।

राजा ने महर्षि के निर्देशानुसार पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से यज्ञ करवाया। यज्ञ संपन्न होने के बाद, महर्षि कश्यप ने यज्ञ से उत्पन्न पवित्र खीर का प्रसाद रानी मालिनी को दिया और कहा कि इसे ग्रहण करने से उन्हें पुत्र की प्राप्ति होगी।

रानी मालिनी ने प्रसन्नतापूर्वक वह खीर ग्रहण की। कुछ समय बाद, रानी गर्भवती हुईं, जिससे पूरे राज्य में खुशी की लहर दौड़ गई। सबको उम्मीद थी कि अब राजा का वंश आगे बढ़ेगा। लेकिन दुर्भाग्य ने उनका साथ नहीं छोड़ा। जब प्रसव का समय आया, तो रानी ने एक मृत शिशु को जन्म दिया।

यह देखकर राजा और रानी पर मानो वज्रपात हो गया। उनके सारे सपने टूट गए, और वे गहरे शोक में डूब गए। राजा प्रियव्रत इतने निराश हो गए कि उन्होंने अपने प्राण त्यागने का निश्चय कर लिया। वे मृत शिशु को लेकर श्मशान की ओर चल पड़े ताकि वहीं अपने जीवन का अंत कर सकें।

जब राजा अपने मृत पुत्र के साथ श्मशान की ओर जा रहे थे, तभी वहाँ एक अलौकिक शक्ति प्रकट हुई। यह कोई और नहीं, बल्कि देवों के सेनापति भगवान कार्तिकेय की पत्नी और भगवान ब्रह्मा की मानस पुत्री षष्ठी देवी थीं, जिन्हें हम छठी मैया के नाम से जानते हैं।

देवी षष्ठी ने राजा को रोकते हुए कहा, "हे राजन! तुम अपने प्राण क्यों त्याग रहे हो? मैं षष्ठी देवी हूँ और मैं सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हूँ। मैं सभी बच्चों की रक्षक हूँ और संतानहीन दंपत्तियों को संतान का सुख प्रदान करती हूँ। जो कोई भी मेरी विधि-विधान से पूजा करता है और मेरा व्रत रखता है, उसे संतान अवश्य प्राप्त होती है।"

देवी ने राजा को बताया कि वे कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को उनका विधिपूर्वक व्रत और पूजा करें। उन्होंने राजा को आशीर्वाद दिया और उसके मृत पुत्र को अपने स्पर्श से पुनः जीवित कर दिया।

राजा प्रियव्रत यह चमत्कार देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने तुरंत मृत पुत्र को गोद में उठाया और षष्ठी देवी के चरणों में प्रणाम किया। राजा ने अपनी रानी के साथ मिलकर देवी के बताए अनुसार श्रद्धापूर्वक षष्ठी का व्रत किया।

इस घटना के बाद से ही, हर वर्ष कार्तिक शुक्ल षष्ठी को संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और संतान प्राप्ति की कामना से छठ पूजा और व्रत करने की परंपरा शुरू हुई। तब से लेकर आज तक, यह पर्व पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।

छठ पूजा के अनुष्ठान

इस वर्ष छठ पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को, 25 अक्टूबर 2025 (शनिवार) से शुरू होकर, 28 अक्टूबर (मंगलवार) को समाप्त होगी। इस वर्ष के मुख्य अनुष्ठान और तिथियां इस प्रकार हैं:

• पहला दिन (25 अक्टूबर 2025, शनिवार) – नहाय खाए

इस दिन से पर्व की शुरुआत होती है। व्रती पवित्र जल से स्नान कर शुद्ध और सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। लौकी, चने की दाल और चावल का भोग बनाकर छठी मैया को अर्पित किया जाता है, और इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

• दूसरा दिन (26 अक्टूबर 2025, रविवार) – खरना

इस दिन शाम के समय गुड़ से बनी खीर का प्रसाद मिट्टी के चूल्हे में बनाया जाता है। प्रसाद छठी मैया को अर्पित कर, पहले व्रती और फिर परिवार के अन्य सदस्य इसे ग्रहण करते हैं। खरना मुख्यतः पंचमी तिथि पर मनाया जाता है। इसके बाद व्रती का निर्जल व्रत प्रारंभ होता है।

• तीसरा दिन (27 अक्टूबर 2025, सोमवार) – संध्या अर्घ्य

इस दिन अर्थात षष्ठी तिथि को शाम को व्रती डूबते सूर्य को जल, दूध और गंगाजल से अर्घ्य देते हैं। घाटों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती है, और सूर्य की आराधना के इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। इस अर्घ्य से परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।

• चौथा दिन (28 अक्टूबर 2025, मंगलवार) – प्रातः अर्घ्य

अंतिम दिन अर्थात सप्तमी को सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, जिसे 'प्रातः अर्घ्य' कहते हैं। इसके बाद व्रती छठी मैया की कथा सुनते हैं और प्रसाद ग्रहण कर व्रत का समापन करते हैं। यह समय अत्यंत पवित्र और भावनात्मक होता है, जब व्रती अपनी तपस्या के समापन पर सूर्यदेव और छठी मैया का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

छठ पूजा के लाभ?

संतान सुख और पारिवारिक कल्याण: यह पर्व संतान प्राप्ति, उनके स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए विशेष रूप से मनाया जाता है, जिससे परिवार में सुख-समृद्धि आती है।

मनोकामना पूर्ति और आध्यात्मिक शुद्धि: सच्चे मन से की गई छठ पूजा से भक्तों की सभी इच्छाएँ पूरी होती हैं। 

छठ पूजा के मंत्र जप

छठ पूजा के लिए मंत्रों का कोई विशेष महत्व नहीं है, यदि महिलायें चाहे तो सूर्य को जल अर्पण करने और अर्घ्य देने में कुछ मूल मंत्रों का उच्चारण कर सकती है। 

सूर्य देव के लिए छठ पूजा मंत्र:

1. ॐ सूर्याय नमः

सूर्य देव को अर्घ्य देते समय बोल सकते है। 

छठ पूजा का महत्व

यह चार दिवसीय महापर्व चतुर्थी तिथि से आरंभ होकर सप्तमी तिथि को संपन्न होता है। हालांकि, तिथियों में उतार-चढ़ाव के कारण कभी-कभी यह षष्ठी तिथि को भी समाप्त हो जाता है। इस पर्व के दौरान श्रद्धालु कठोर नियमों का पालन करते हैं और संपूर्ण शुद्धता के साथ व्रत का पालन करते हैं। छठ पूजा की खास बात यह है कि इसमें उगते और 

की रक्षक माना जाता है। इनकी पूजा से जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली की प्राप्ति होती है।

छठ पूजा की विशेषता

छठ पर्व के दौरान महिलायें छठी मैया को ध्यान में रखकर सूर्य को अर्घ्य देती है, समान्यता यह पर्व महिलायें अपने कुटुंब जैसे पति , संतान, घर-परिवार इन सभी के लिए पूरे दिन निर्जल उपवास रखती है। छठ के दौरान कोसी भरने की मान्यता भी बहुत प्रचलित है। कोसी एक मिट्टी का पात्र है जिसमे अन्न और गन्ना पूजा के घाट पर रखकर सूर्य देव को अर्पित किया जाता है। ये प्रचलन घर में मंगल कार्य का द्योतक होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. छठ पूजा किस राज्य में मनाई जाती है?

छठ पूजा आमतौर पर पूरे विश्व में मनाया जाता है लेकिन मुख्यता उत्तर प्रदेश के पूर्वाञ्चल जिलों में जैसे-बलिया, बनारस, आजमगढ़ और झारखंड के कुछ जिले जैसे-रांची, गिरडी और झरिया में और पूर्णतया बिहार के सभी जिलों में मनाया जाता है। 

2. हम छठ पूजा क्यों मनाते हैं?

यह पर्व मुख्य रूप से संतान की रक्षा, अच्छे स्वास्थ्य, कुटुंब की समृद्धि, दीर्घायु और पारिवारिक सुख-शांति के लिए मनाया जाता है, जिसे महिलाएं विशेष रूप से अपने परिवार की मंगलकामना हेतु करती हैं।

3. घर पर छठ पूजा कैसे करें

यदि आप छठ पूजा घर पर करना चाहते हैं, तो अपने आँगन या छत पर एक छोटा कृत्रिम तालाब या जलकुंड बना सकते हैं। अर्घ्य देने के समय आप उसी जलकुंड में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित कर सकते हैं। घर पर पूजा करते समय भी आप छठ पूजा की पारंपरिक विधियों का पालन करें—जैसे कि नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य। श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया यह व्रत घर पर भी उतना ही पुण्यदायी और प्रभावशाली माना जाता है।

4. 2025 में छठ पूजा कब शुरू होगी?

इस वर्ष छठ पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से, 25 अक्टूबर 2025 (शनिवार) को आरंभ होकर 28 अक्टूबर 2025 (मंगलवार) तक मनाई जाएगी।

5. इसे छठ पूजा क्यों कहा जाता है?

छठ पूजा की शुरुआत कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से होती है पर इसकी मुख्य पूजा और मनाने का दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी का है और इसी दिन पूजा की जाती है। षष्ठी से छठ शब्द बना है और इसी दिन पूजा करने के कारण इसे छठ पूजा कहते है। 

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